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सावन विशेष: शिव के प्रिय..

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सावन विशेष: भगवान  शिव के प्रिय कौन हैं?  जानिए   सावन आये और शिव का नाम न हो!! ऐसा कैसा हो सकता है। जैसे सावन की बारिश से धरती का वातावरण साफ और शुद्ध हो जाता है वैसे ही सावन में शिव के नाम से ही मन भी निर्मल होने लगता है। सावन माह की बारिश में हर वनस्पति अपने वृद्धिकाल में होती है इसलिए धरती का कोना कोना हरियाली से भरा रहता है और जब प्रकृति अपने इस सुंदर रूप में होगी तो मन का चंचल होना स्वाभाविक है। ऐसे में जहां मन अस्थिर होता है वहीं सावन में मन को स्थिर और शांत रखने के लिए शिव का ध्यान किया जाता है। ऐसे में प्रकृति स्वयं हमारे  मानसिक नियंत्रण एवं आध्यात्मिक विकास के लिए हमें भगवान शिव के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित करती है और फिर हम सभी भक्त भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा अर्चना में लग जाते हैं चूंकि प्रकृति स्वयं शिवा अर्थात पार्वती है जो शिव का ही भाग है इसलिए प्रकृति के साथ पूरा वातावरण ही शिवमय हो जाता है और हमारा मन भी शिव में लीन होने लगता है।   हिंदू धर्म में माना जाता है कि भगवान शिव को समर्पित इस विशेष काल में शिव नाम से ही मा...

सर्दियों में रखें सेहत का खास ख्याल!! (Healthcare in winters)

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सर्दियों में रखें सेहत का खास ख्याल!!    सर्दियों के मौसम का अपना अलग आनंद होता है। जहां हम तरह तरह के मौसमी फल और सब्जियों का आनंद लेते हैं वहीं सर्दियों की धूप अलग ही गर्माहट देती है। साथ ही सर्दियों में परिवार और दोस्तों के साथ तो घूमने का अपना अलग ही मजा होता है लेकिन इस मौसम के साथ स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी थोड़ी बढ़ जाती है। सर्दी जुकाम, जकड़न या गले में खराश तो आम है लेकिन साथ ही अन्य रोग भी पैर पसारने लगते हैं इसलिए जाड़ों में मस्ती मजा के साथ उचित खान पान और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने से सर्दियों का आनंद दुगुना करें। - सर्दियां हैं तो खूब गाजर, टमाटर, पालक, मेथी, सरसों, नींबू अमरूद, पपीता और मेवा जैसी चीजें खाने में शामिल करें। मौसमी फल सब्जियां हमेशा शरीर को तंदुरुस्त बनाए रखती हैं। गाजर टमाटर चुकंदर का रस या सूप केवल सेहत ही नहीं सौंदर्य में भी चार चांद लगाता है। - सर्दियों में अमूमन आलस्य के कारण लोग अपनी कसरत या व्यायाम पर रोक लगा देते हैं जबकि इस मौसम में शरीर के अंगों को व्यायाम की आवश्यकता अधिक रहती है। काम से कम आधा घंटा व्यायाम नियमित ...

उत्तराखंड का लोक पर्व: इगास (पहाड़ी दिवाली)

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उत्तराखंड का लोक पर्व: इगास (पहाड़ी दिवाली)     शहरी दिवाली तो मना चुके हैं अब बारी है पहाड़ी इगास बग्वाल मनाने की। इगास का अर्थ है एकादशी। गढ़वाली में एकादशी को इगास कहा जाता है और बग्वाल को दिवाली। दिवाली के 11 दिन बाद आने वाली शुक्ल एकादशी को गढ़वाल में इगास का उत्सव होता है। उत्तराखंड का यह खास त्यौहार इगास भी प्रकाशपर्व है। जैसे दिवाली को दीपोत्सव माना जाता है वैसे ही इगास पहाड़ की दिवाली है इसलिए दीपक तो जलेंगे ही और पकवान भी बनेंगे ही। इगास क्यों मनाया जाता है  पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि भगवान राम के 14 वर्ष के वनवास से अयोध्या लौटने की खबर गढ़वाल में 11 दिन बाद मिली इसी कारण से गढ़वाल में दिवाली 11 दिन बाद मनाई गई। वैसे कहा जाता है कि गढ़वाल में चार बग्वाल दिवाली होती है। पहली कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी फिर अमावस्या वाली बड़ी दिवाली जो पूरा देश मनाता है। इस दिवाली के 11 दिन बाद आती है इगास बग्वाल और चौथी बग्वाल बड़ी दिवाली के एक महीने बाद वाली अमावस्या को मनाते हैं। चौथी बग्वाल जौनपुर प्रतापनगर, रंवाई जैसे इलाकों में मनाई जात...

उत्तराखंड का मंडुआ/ कोदा/ क्वादु/ चुन

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उत्तराखंड का मंडुआ/ कोदा/ क्वादु/ चुन    सर्दियों की गुलाबी ठंड शुरू हो चुकी है। घर के दीवान, संदूक या अलमारी से गर्म कपड़ों का छत या बालकनी में धूप लगाना भी शुरू हो चुका है और साथ ही पहनना भी। कपड़े ही क्या हमारा खानपान में भी बहुत से बदलाव होने लगे है। ठंडे शरबत या शेक्स की जगह गर्म सूप और चाय कॉफी ने ले ली है। ठंडी तासीर के बजाए गर्म तासीर वाले व्यंजनों को रसोई में ज्यादा जगह मिल रही है और साथ ही मोटे अनाज का सेवन भी बढ़ रहा है।    और अगर बात उत्तराखंड की हो तो सर्दियों के आरंभ के साथ ही मोटा अनाज कहे जाने वाले उत्तराखंड के पारंपरिक अनाज का काला राजा मंडुआ/ कोदा/ क्वादु/ चून का उपभोग अधिक होने लगता है।        मंडुआ जिसे हम फिंगर मिलेट  कहते हैं। इसे रागी के नाम से अधिक पहचाना जाता है। वैसे इसका वैज्ञानिक नाम एलिसाइन कोराकाना है। मुख्यरूप से कोदा यूगांडा और इथोपिया का मोटा अनाज है। लगभग 3 से 4000 वर्ष पूर्व यह भारत आया और अब भारत विश्व का सबसे अधिक मंडुआ उत्पादन करने वाला देश हो चुका है। उड़ीसा, तमिलनाडु, महाराष्ट्र के साथ साथ ...

करवा चौथ में चूड़ियों का संसार...

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करवा चौथ में चूड़ियों का संसार...        रंग बिरंगी चूड़ियों के संसार में एक बार अगर महिलाएं घुस जाएं तो उनका वहां से बाहर आना बहुत मुश्किल हो जाता है क्योंकि ये पहले से ही हमेशा आकर्षण का केंद्र रही हैं। महिलाओं के लिए ये चूड़ियां केवल श्रृंगार ही नहीं अपितु सुहाग का प्रतीक भी हैं।     कलाइयों की शोभा इन्हीं सुंदर सुंदर चूड़ियों से होती है जो वैदिक काल से ही स्त्रियों की पसंद है लेकिन चूड़ियों को सुहाग का प्रतीक मध्यकालीन से माना गया। तभी तो करवाचौथ में चूड़ियां खूबसूरती बढ़ाने के साथ सुहाग का द्योतक भी होता है।      हड़प्पा व मोहनजोदड़ो की खुदाई से जो प्रमाण प्राप्त हुए हैं उनसे ज्ञात होता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के लोग अपनी कलाई में धातु से बना कंगन जैसा कोई आभूषण पहनते थे।     लाल, हरी, नीली, गुलाबी, पीली या सुनहरी किसी भी रंग की चूड़ियां हो बस कलाइयों में जाते ही सब रंग एक से बढ़कर एक लगते हैं।     चूड़ी बिना श्रृंगार अधूरा और श्रृंगार बिना करवा चौथ अधूरा। करवाचौथ के त्योहार में सुहागि...

गायब होता संतोष ...

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गायब होता संतोष...   मजदूरों की झोपड़ी से गाने की आवाज आई और उस भजन को सुनते ही कुछ याद आया। बस फिर क्या था ! फिल्म तो याद आई ही साथ ही माता का यह रूप भी याद आया।    बहुत सालों पहले एक फिल्म आई थी 'जय संतोषी मां' । ये उस समय की शोले जैसी फिल्म की तरह ही ब्लॉक बस्टर थी। जब लोग इस फिल्म को देखने सिनेमा हाल जाते थे तब अपने जूते चप्पल भी बाहर उतारते थे और जब फिल्म में माता संतोषी का आगमन होता था तो फूल और सिक्के भी पर्दे की ओर उछालते थे।     और जब 'जय संतोषी मां' फिल्म दूरदर्शन पर आई तो लोग हाथ जोड़े फिल्म को देख रहे थे और जैसे ही माता के दर्शन होते सभी जय संतोषी माता के नारे लगाते। इस फिल्म में तो साधारण से किरदार निभाने वाले अभिनेताओं को भी खूब प्रसिद्धि मिली।    चित्र आभार: गूगल     हालांकि माता संतोषी की पूजा अर्चना मुख्यत: उत्तर प्रदेश में ही की जाती थी लेकिन इसके बाद उनकी महिमा से कोई अछूता नहीं रहा और उसके बाद क्या उत्तर और क्या दक्षिण। माता संतोषी की पूजा पूरे देश में होने लगी।    घर की सुख, शांति, स...

उत्तरकाशी यात्रा: तीन घंटों में तीन तीर्थ

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उत्तरकाशी यात्रा: तीन घंटों में तीन तीर्थ     लक्ष्य लेकर काम करो तो जरूर पूरा होता है।।    देहरादून से उत्तरकाशी की दूरी लगभग 145 किमी है और हमें एक ही दिन में लौटा फेरी करनी थी इसीलिए सुबह 6 बजे निकलने की सोची ताकि 11 या 11:30 बजे तक उत्तरकाशी पहुंचा जा सके और हम सुबह 6:15 बजे के आसपास तैयार भी हो गए लेकिन जैसे ही गाड़ी में बैठने को हुए तो देखा कि आगे का टायर तो पंचर है। अब बाकी का काम तो विकास का ही था तो बिना देरी किए विकास मैकेनिक के किरदार में आ गए। वैसे मैकेनिक ही क्या वो तो घर या ऑफिस के भी छोटे मोटे काम करते हुए कभी इलेक्ट्रीशियन तो कभी प्लंबर भी बन जाते हैं।    मैकेनिक तो जैसे भी हो लेकिन सुबह सुबह उस इंसान की वर्जिश तगड़ी हो गई जिसने कभी कसरत का 'क'   भी न जाना हो। खैर! 45 मिनट के बाद आखिर घर से निकल ही गए। गाड़ी में बैठकर सोच रही थी कि अपना लक्ष्य तो बना लो लेकिन आगे आने वाली अनचाही और अप्रयाशित  (unpridict) चुनौतियों का क्या??    आज के सफर में पिछले साल के दिसंबर की याद ताजा हो गई जब हम हर्षिल गए थे...

गांधीवादी से गांधीगिरी तक!!

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गांधीवादी से गांधीगिरी तक!!   गांधी जी के बारे में इतना लिख और पढ़ चुके हैं लोग कि अब और कुछ बचा नहीं है बताने को तभी तो आज अगर पूछा जाए कि ऐसा कौन है जो गांधी को सुनना, देखना या पढ़ना पसंद करता हो तो जवाब में बहुत कम ही लोग हामी भरेंगे। उनके विषय में आज शायद सबके अपने अपने विचार और तर्क होंगे लेकिन राष्ट्रपिता तो वही हैं।    अब भले ही लोग गांधी से प्रेम करें या न करें लेकिन गांधी जयंती से प्रेम तो करते ही हैं क्योंकि इस दिन अवकाश का आनंद जो मिलता है और अवकाश का आनंद तो दोगुना तब हो जाता है जब अगले दिन भी शनिवार या रविवार हो।    इस बार भी ऐसा ही योग बना है कि अब छुट्टी का मजा दो दिन तक रहेगा लेकिन क्या हम भी गांधी जयंती में गांधी जी को याद करेंगे?? ये भी सोचना पड़ेगा न!!     आज समय के साथ भले ही बहुतों के मन से गांधीवादी विचार धुल रहे हों लेकिन उनकी अहिंसक छवि मिटी नहीं है और आज भी जब बच्चा उनके चित्र के सामने खड़े होकर पूछता है कि ये कौन है?? तो हमारे मुंह से एक सुर में निकलता है 'राष्ट्रपिता महात्मा गांधी'। इसलिए ये तो मानना ही पड़ेगा कि ...

बचपन की खट्टी मीठी कैंडी...पोप्पिंस (Poppins)

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बचपन की खट्टी मीठी कैंडी...पोप्पिंस (Poppins) आ गई न अपने बचपन की याद। पोप्पिंस नाम ही ऐसा है जिसे सुनकर बचपन की इंद्रधनुषी फलों की गोलियां याद आ जाती है। इसके साथ टैग लाइन भी जुड़ी थी,,,'पारले पोप्पिंस... दूं क्या।' अब तो याद आ ही गया होगा।   इसबार जब मैं एक सुपरस्टोर में गई तो एक कोने में जाकर ठहर गई क्योंकि ऐसा लगा कि शायद मेरा बचपन भी वहीं कहीं कोने में छिपा हुआ है।     इस रंग बिरंगे बचपन से मिलकर कुछ समय के लिए मैं भूल गई कि मैं कहां हूं और उसे ऐसे समेटने लगी जैसे कि अब ये फिर से मुझे कभी नहीं मिल पाएगा।     अब अपनी इस हरकत पर मुझे थोड़ी शर्म भी आ रही है क्योंकि जिन लोगों ने मुझे देखा होगा उन्होंने मुझे पक्का भूखी भीखारन समझा होगा क्योंकि उन्हें मैं ऐसे समेट रही थी जैसे की भंडारे में हलवा इकट्ठा कर रही हूं कि थोड़ी ही देर में ये खतम हो जाएगा इसलिए जल्दी से ले लो। इसी सोच से मैंने एक नहीं दो नहीं बल्कि जितनी भी उस डिब्बे में बची थी सब अपनी गाड़ी में भर ली।   खैर, छोड़ो! किसी ने चाहे जैसा भी सोचा हो सच तो यह है कि बचपन तो हर किसी का निर...

मजेदार यात्रा या जाम की उलझन...

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मजेदार यात्रा या जाम की उलझन... पिछले रविवार को रुड़की जाना हुआ और वो भी बच्चों के साथ। लंबे समय के बाद बच्चों की दूसरे शहर जाने की पहली यात्रा थी इसलिए बच्चे तो अपनी पूरी मस्ती में होंगे ही। उनके लिए तो यात्रा का कारण चाहे कुछ भी हो उद्देश्य तो पिकनिक पर जाने वाला होता है लेकिन बच्चों के साथ मेरे लिए भी ये एक नया अनुभव था क्योंकि मैं भी बहुत समय के बाद इस तरफ जा रही थी। सुना था कि दिल्ली जाते समय डाट काली मंदिर के पास अब जाम नहीं लगेगा क्योंकि अब दिल्ली जाने के लिए मंदिर के साथ एक नई डबल लेन टनल का निर्माण हो चुका है। जहां पहले सहारनपुर या दिल्ली जाते समय डाट काली की पुरानी सुरंग में कई बार जाम में फंसना पड़ता था वहीं अब डबल लेन में सरपट आगे बढ़ा जा सकता है।    चूंकि हम लोग हिंदू हैं तो रास्ते में आने वाले सभी मंदिरों में सिर अपने आप ही झुक जाता है इसीलिए इस रास्ते के जाम का तो पता नहीं लेकिन मंदिर के आगे से गुजरना जरूर याद आया।      डाट काली मंदिर 2011     खैर, मोहंड के जंगलों से आगे निकलकर बिहारीगढ़ के पकौड़े भी याद आए लेकिन...

कंजूसी, बचत या मेरा आलस

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कंजूसी, बचत या मेरा आलस    शायद पिछले हफ्ते भर से इस टूथपेस्ट को फेंकने की सोच रही हूं लेकिन हिम्मत ही नहीं हो रही। क्योंकि जितनी बार इसके ढक्कन को खोलकर इस पेस्ट को यहां वहां पिचकाकर और तोड़ मरोड़ करती हूं उतनी बार ये पेस्ट डस्टबीन में जाने से बच जाता है और हर बार इसमें से मेरे ब्रश लायक तो टूथ पेस्ट निकल ही जा रहा है। प्रतिदिन मैं उत्सुकता और संशय दोनों के साथ सोचती हूं कि "क्या आज इस ट्यूब से टूथपेस्ट निकलेगा??" और वो झट से मुस्कुराता हुआ ट्यूब से निकलकर मेरा भ्रम तोड़ देता है।      हफ्ते भर से यही सोचती रही कि इस ट्यूब को फेंक दूंगी और स्टोर रूम से नया दातुन निकाल लूंगी लेकिन हर एक सुबह फिर से ख्याल आता है कि एक बार और मोड़कर देख लेती हूं अगर पेस्ट निकला तो ठीक है नहीं तो रात को तो नया रख ही लूंगी लेकिन नया रखने की नौबत तो आ ही नहीं रही।  बस थोड़ी सी कोशिश और ब्रश के मुखड़े पर लाली सज गई। लगता है, हर सुबह ही क्या हर रात में भी मेरे ब्रश का साथी बनने की जिद्द में है।     दो तीन दिन पहले तो लगा कि इस ट्यूब में पेस्ट कब खत्म हो ...

5 सितंबर.. शिक्षक दिवस (Teachers Day)" मैं बड़ा होकर शिक्षक बनूंगा!!"

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5 सितंबर.. शिक्षक दिवस (Teachers Day) " मैं बड़ा होकर शिक्षक बनूंगा!!"   "मैं बड़ा होकर एक शिक्षक बनूंगा।" ऐसा आजकल बहुत कम ही सुनने को मिलता है।क्या आपने भी ऐसा किसी बच्चे के मुंह से सुना है कि वह बड़ा होकर एक शिक्षक बनना चाहता है?? शायद नहीं। आज हर बच्चे को डॉक्टर बनना है, इंजीनियर बनना है, पायलट बनना है, वकील बनना है, सैनिक बनना है, बैंकर बनना है, अफसर बनना है लेकिन शिक्षक नहीं!! और अगर किसी बच्चे को बनना भी है तो वो भी केवल किसी शिक्षक के प्रति मोह होगा जो कुछ समय के बाद गायब हो जाता है। उस बच्चे को अक्षर ज्ञान कराने वाले सबसे पहले एक शिक्षक ही होता है पर ऐसा क्यों है कि उसे अब शिक्षक नहीं बनना होता। शायद उसे शिक्षक की नौकरी में किसी प्रकार का आकर्षण नहीं लगता या घर परिवार की मंशा अन्य क्षेत्रों में जाने की हो या फिर आजकल के शिक्षकों की स्थिति ऐसी है कि कोई बच्चा भविष्य में शिक्षक बनने की कल्पना करना ही नहीं चाहता। या फिर आज का विद्यार्थी और आज का शिक्षक दोनों बस अंकों के फेर तक ही सीमित हो चुके हैं इसीलिए कुछ कल्पना परिकल्पना से दूर ही हैं।       आज...

कृष्ण जन्माष्टमी: भगवान कृष्ण के साथ माता यशोदा का पूजन

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कृष्ण जन्माष्टमी:  भगवान कृष्ण के साथ माता यशोदा का पूजन (Krishna Birthday)       Pic courte: freepik      कृष्ण जन्माष्टमी है तो कृष्ण का ही सुमिरन होगा। भादौ मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान कृष्ण का जन्मदिवस एक पर्व होता है जिसे घर घर में उत्सव के रूप में मनाया जाता है। चाहे मंदिर हो, घर हो, पास पड़ोस का आंगन हो या किसी गली मोहल्ले का मैदान कृष्ण की लीलाओं की झांकी तो दिख ही जाती है। जितनी लीलाएं उतने नाम। चारों ओर बस कृष्ण-कृष्ण और बस राधे-राधे।     कृष्ण की तो इतनी विशेषताएं हैं कि उनको गिना नहीं जा सकता और न ही उनके जैसा बना जा सकता है क्योंकि वे तो मानव अवतार में स्वयं भगवान विष्णु जी हैं और भगवान बनना हम मानवों के बस की बात नहीं तो बस आंख मूंद कर उनका स्मरण करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि जिसप्रकार से भगवान कृष्ण ने लोगों की संकट में सहायता की वैसे ही वे हम सभी के कष्ट हरेंगे।    लेकिन कृष्ण जन्माष्टमी में हम किसी भी दुख या कष्ट के लिए सुमिरन नहीं करते। जन्माष्टमी तो उत्सव होता है भगवान कृष्ण के जन्म का तो ...

स्वतंत्रता दिवस...उड़ना अभी बाकी है।।

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स्वतंत्रता दिवस...उड़ना अभी बाकी है।।     74 साल तो हो चुके हैं भारत को आजाद हुए लेकिन आज भी स्वतंत्रता दिवस मनाने की खुशी भारत के हर नागरिक को पहले जैसी ही है। आज भी जब इस दिन लालकिले पर लहराते हुए तिरंगे को देखते हैं तो लोग उतने ही गर्वित होते हैं जितना आजादी के समय हुआ करते थे और जब बैंड के साथ राष्ट्रीय गान की धुन कानों में पड़ती है तो दिल में देश के प्रति समर्पण का भाव स्वतः ही उमड़ पड़ता है और इसी के साथ ही याद दिलाता है भारत के अनेक वीरों को जिनके अथक प्रयासों से हमें कभी मुगल तो कभी अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिली।      भारतीयों का स्वतंत्रता दिवस में इसप्रकार से खुश होना, गर्वित होना, उमंग से भर जाना बड़ा ही सामान्य है क्योंकि प्रत्येक नागरिक चाहे वह किसी भी देश का हो अपने देश के प्रति प्यार और समर्पण का भाव हमेशा दिल में संजोए रखता है और अपने देश भक्ति का ये उत्साह तो तब और भी दुगना हो जाता है जब वह परदेस में हो।     ऐसा ही जज्बा और जोश हमने अभी हाल ही में आयोजित ओलंपिक खेलों में भी दिखाई दिया। जब भारत के खिलाड़ी टोक्यो 202...