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Showing posts from January, 2021

देहरादून: बदलता मौसम...

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देहरादून: बदलता मौसम...    चलो अब तो बारिश हुई और अब जाकर कुछ ठंडक मिली है नहीं तो गर्मी से सब सूख रहे थे। वैसे गर्मियों के दिन है तो गर्मी पड़ेगी ही लेकिन इतनी गर्मी पड़ेगी इसका अंदाज़ा नहीं था। हालांकि हर वर्ष यही कहा जाता है कि पिछले वर्ष की तुलना में इस साल बहुत गर्मी है लेकिन सच में देहरादून में ऐसी गर्मी का अनुभव पहली बार ही हुआ क्योंकि भले ही देहरादून में तीन चार दिन जलनखोर गर्मी हो लेकिन उसके अगले दिन ठंडक देने बरखा रानी आ ही जाती थी। मगर जाने क्या हुआ इस बार कि बारिश को आते आते 15-20 दिन लग गए लेकिन देर से ही सही अब राहत मिली है क्योंकि बारिश के बाद गर्म मौसम यहाँ उमस नहीं अपितु ठंडा कर देता है।    यहाँ के मौसम का मिजाज ऐसा है कि बस एक बारिश की फुहार और फिर तपने वाला देहरादून ठंडक वाली दून घाटी में बदल जाता है। इसलिए कहा जाता है कि देहरादून के मौसम का कुछ पता नहीं चलता, कब पलट जाए। तभी तो कब से उम्मीद लगा के बैठे थे कि देहरादून का पारा तीन- चार दिन बढ़ते बढ़ते अब तो पलटी मार के नीचे लुढ़क ही जायेगा लेकिन इस बार हमारा ये ख्याल हवा हो गया। देहरादून जो हमेशा से अपने ख

नये साल में नये 'resolutions'

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               पिछला साल कोरोना काल के नाम ही रहा। बस एक होली ही ढंग से मना पाए थे कि कुछ ही दिनों बाद हमें भी धीरे-धीरे झटके लगने आरंभ हो गए। पहले तो समय रसोई में नये नये पकवानों के साथ बीता, फिर मन को संतोष दिया कि ये एक प्रकार का अनुभव है, जिसमें हम परिवार में एक साथ रहते हुए छुट्टीयां मना रहे हैं। फिर जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता गया, लॉकड़ाउन भी आगे खिसकता गया और तब न पकवान रास आये और न ही छुट्टियों का आनंद अनुभव हुआ और बस इसके साथ ही भयंकरता का अंदाजा भी लग गया। फिर तो आप सभी जानते ही हैं कि आपने अपने जीवन में क्या-क्या अनुभव लिया।      2020 तो बस कोरोना की भेंट चढ़ गया। पिछला साल बहुत से लोगों के लिए अच्छा नहीं गया, उन्हीं में से एक हम भी हैं और अगर आप एक मध्यमवर्गीय परिवार से हैं तो फिर तो आपको भी इसकी अच्छे से समझ होगी ही।    अब पिछला साल कैसा गया, क्यों हुआ, क्या हो सकता था, क्या सबक मिला, ये सब पुराना हो गया है। या यूँ कहे कि अब लोग उकता गए है, इन सबसे। अब तो नये साल में कुछ नया सोचने और करने का समय है और इस समय नई आशा, विश्वास, होंसलें और नई आस का आगमन होना ही आचाहिए

गणतंत्र दिवस...आओ थोड़ा शीश झुकाएं

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      जिस उद्योग की गति रफ्तार से भाग रही थी कोरोना काल के कारण उसी की चाल थोड़ी धीमी हो गई है और बहुत से साथी इससे प्रभावित भी हुए हैं इसीलिए गणतंत्र दिवस पर ये एक छोटी सी कविता मेरे उन साथियों के लिए है जो होटल और पर्यटन उद्योग से जुड़े हैं।  आओ थोड़ा शीश झुकाएं,            कुछ पल वंदे मातरम् गाएं।  छोड़ पुराने काले दिनों को,           नई आशा के दीप जलाएं।  रुकी चाल से फिर धीमी हुई,            अब चलो आगे बढ़ जाएं।  कुछ सोचें नवीन तो,             कुछ पुरानी सीढ़ी चढ़ जाएं।  महापुरषों को याद करें,              अपनी हिम्मत को पहचानें। साथी सभी अब मिलकर,              आओ थोड़ा शीश झुकाएं।  कुछ पल वंदे मातरम् गाएं ।               कुछ पल वंदे मातरम् गाएं।।  (Dedicated to Hotel &Tourism Industry)  एक-Naari

ननिहाल का आनंद

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     ननिहाल नाम सुनते ही शायद आप भी अपने बचपन के दिन याद करते होंगें। सिर्फ ननिहाल का नाम आते ही कितने सारे रिश्ते जीवंत हो जाते हैं। इस शब्द को सुनते ही नाना, नानी, मौसी, मामा, भाई, बहन सब याद आ जाते हैं। सारी यादें ताजा हो जाती हैं। नाना नानी का दुलार, मामा मौसी का प्यार और भाई बहनों का आपस में खेल और तकरार सब के सब दृश्य आँखों के सामने दौड़ने लगते हैं कि किस प्रकार से धमा चौकड़ी किया करते थे।    वैसे तो सबको पता ही है कि ननिहाल का अर्थ है, नाना का घर, लेकिन बच्चों के लिए तो नाना के घर का मतलब है मौज मस्ती, आजादी, आनंद, शरारत, कहानियाँ, किस्से, लाड और दुलार।     असली ननिहाल तो हम बचपन में ही देखते हैं, जब गर्मियों की छुट्टियों में ननिहाल जाना होता था। जितनी उत्साही माँ अपने मायके जाने के लिए होती थी उससे कहीं अधिक आतुर तो बच्चें अपनी ननिहाल जाने के लिए होते थे। माँ को खुशी तो बस अपने माँ बापू जी और भाई बहन से मिलकर होती थी लेकिन हम बच्चों की खुशी तो नाना नानी से मिलने से अधिक तो ममेरे और मौसेरे भाई बहन से मिलने की होती थी और साथ ही साथ अपनी आजादी और रौब जमाने की गुदगुदी भ

मिशन वैक्सीन,,,सावधानी फिर भी बाकी है,,,

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   आखिर वो दिन आ ही गया जिसकी प्रतिक्षा हमारा देश अप्रैल 2020 से कर रहा था। जब से कोरोना महामारी आयी है, तब से हर देश कोरोना बिमारी का तोड़, कोई दवाई या टीका का आविष्कार करने में जुटा हुआ था। यहाँ तक कि प्रमुख और शक्तिशाली देशों के बीच टीके को विकसित करने की होड़ भी लगी हुई थी। ऐसा मानों कि देश को टीका इसलिए विकसित नहीं करना है कि उसे अपने नागरिकों की चिंता है अपितु उसे तो विश्व में प्रथम श्रेणी में आना है। दुनिया में प्रतिस्पर्धा जो हो रही थी कि आखिर पहले कोरोना का टीका  विकसित कौन करेगा??      हालांकि स्पुतनिक-V (Sputnik-V), मॉडर्ना (Moderna), फ़ाइज़र/बायोएनटेक नामक कोरोना वैक्सीन को  रूस, अमेरिका, ब्रिटेन (Russia) जैसे विकसित देशों ने आपातकालीन स्थिति में टीका लगाने की अनुमति दे दी है। अब जब ये देश अपने सबसे बड़े टीकाकरण अभियान के लिए तैयार है तो भला भारत कैसे पीछे छुट सकता है।    भारत की बात की जाय तो दो राय नहीं है कि लगभग साल भर से पहले ही कोरोना टीके का दूसरा और तीसरा विकास के चरण का परीक्षण और निरीक्षण भी हो गया है और अब इसे सार्वजनिक रूप से टीकाकरण अभियान के रूप

क्रिसमस पर हर्षिल (मिनी स्विजेरलैंड) की यात्रा का अनुभव (भाग - २)Experience of Harshil (Mini Switzerland) visit on Christmas (part 2)

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पिछले लेख में मैंनें अपनी हर्षिल तक पहुँचने का वर्णन किया था और ये भी कहा था कि असली हर्षिल तो देखना अभी बाकी है। इसीलिए अब आगे बढ़ते हैं कि क्या था हर्षिल में जो हम इतनी दूर चले आये।।।।     थकान के कारण काफी देर के बाद नींद आयी थी। इसीलिए बेसुध होकर सो रही थी। अचानक से खिड़की की ओर से कुछ शोर सुनाई दिया, खिड़की पीटने का सा और नींद टूट गई। खिड़की की ओर देखा तो  रोशनी आ रही थी और साथ ही साथ विकास की आवाज भी, " जल्दी बाहर आओ" बस इतना बोलना हुआ कि बच्चे भी उठ गए और खिड़की की ओर चल पड़े। सुस्ताते हुए सोचा कि अब विकास को क्या मिल गया है यहाँ!! तभी तन्नु भी चिल्लाई,"वाऊ " बस उसका 'वाऊ' काफी था मुझे अपनी गर्म रजाई छोड़ने के लिए। खिड़की से बाहर झांका तो विकास और मन्नु दोनों गेस्ट हाउस में टहल रहे थे। सामने से बर्फ से ढ़के पहाड़ दिख रहे थे और सुबह सुबह उस दृश्य को देखने से ही मेरा पूरा दिन बन गया। अभी सिर्फ खिड़की से ही निहार रही थी कि मेरे दोनों बच्चें भी मुझे बाहर नज़र आ गए।     उन्हें तो सिर्फ बर्फ से मतलब था, क्योंकि 'स्नोमैन' जो

क्रिसमस पर हर्षिल (मिनी स्विजेरलैंड) की यात्रा का अनुभव Experience of Harshil (Mini Switzerland) visit on Christmas

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सुबह के 8:15 बज गए है और हम सब चल पड़े हैं अपनी गाड़ी से हर्षिल की ओर। 2347 रुपए का पेट्रोल डाला गया और गाड़ी के पेट्रोल की डिग्गी हो गई फुल। जितना पेट्रोल गाड़ी में उससे कहीं अधिक गाड़ी में सामान। बड़ा बैग, छोटा बैग, ट्रॉली बैग, हैंड बैग, एक चादर, एक कंबल और एक रजाई भी। ऐसा लग रहा है कि हमारी गाड़ी एक मालवाहक गाड़ी में बदल गई। और जो पड़ोसियों ने हमें देखा होगा उन्हें तो लगा होगा कि हम महीने भर के लिए कहीं जा रहें हैं, लेकिन क्या करें  इस यात्रा में मेरे दो बच्चें जो मेरे साथ हैं एक 10 साल की बेटी जिया और एक 3 साल का बेटा जय। इसीलिए क्या करूँ, कुछ 'एक्स्ट्रा केयर वाली फीलिंग' हर माँ को होती ही है। कोरोना आने के बाद बच्चों का शहर से बाहर घूमने की यात्रा पहली बार थी, इसीलिए मास्क, सैनिटाइजर और सीख साथ साथ चल रही थी। जिया का उत्साह तो दो दिन पहले से ही बन गया था और भोले-भाले लेकिन चतुर जय को कुछ नहीं पता था हर्षिल के बारे में लेकिन जिया ने अपने छोटे भाई को भी बर्फ का नाम ले-लेकर उत्साहित कर दिया था। बस जैसे ही गाड़ी में बैठे बातूनी जय का राग अलापना शुरू हो गया,,,,''पाप