Posts

Showing posts from September, 2021

उत्तराखंड में मकर संक्रांति और पकवान

Image
उत्तराखंड में मकर संक्रांति का खानपान      नए वर्ष के आरंभ होते ही पहला उत्सव हमें मकर संक्रांति में रूप में मिलता है। इस संक्रति में सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है इसलिए इसे मकर संक्रांति कहते हैं। इसको उत्तरायणी भी कहा जाता है क्योंकि सूर्य दक्षिण दिशा से उत्तर की दिशा की ओर आता है। इसलिए आज से दिन लंबे और रात छोटी होने लगती है।  मकर संक्रांति का महत्व:   मकर संक्रांति का महत्व हिंदू शास्त्र में इसलिए भी है क्योंकि सूर्य देव अपने पुत्र जो मकर राशि के स्वामी हैं शनि से मिलते हैं जो ज्योतिषी विद्या में महत्वपूर्ण योग होता है। इसलिए माना जाता है कि इस योग में स्नान, ध्यान और दान से पुण्य मिलता है। वैसे इस दिन भगवान विष्णु की भी पूजा की जाती है क्योंकि कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने इस दिन मधु कैटभ दानवों का अंत किया था।    मकर संक्रांति से ही शुभ कार्यों का आरंभ भी हो जाता है क्योंकि उत्तरायण में हम 'देवों के दिन' और दक्षिणायन में हम रात मानते हैं इसलिए मांगलिक कार्यों का आरंभ आज से हो जाता है।    यहां तक कि माना जाता है कि उत्तरायण में मृत्यु से श्री चरणों में म

बचपन की खट्टी मीठी कैंडी...पोप्पिंस (Poppins)

Image
बचपन की खट्टी मीठी कैंडी...पोप्पिंस (Poppins) आ गई न अपने बचपन की याद। पोप्पिंस नाम ही ऐसा है जिसे सुनकर बचपन की इंद्रधनुषी फलों की गोलियां याद आ जाती है। इसके साथ टैग लाइन भी जुड़ी थी,,,'पारले पोप्पिंस... दूं क्या।' अब तो याद आ ही गया होगा।   इसबार जब मैं एक सुपरस्टोर में गई तो एक कोने में जाकर ठहर गई क्योंकि ऐसा लगा कि शायद मेरा बचपन भी वहीं कहीं कोने में छिपा हुआ है।     इस रंग बिरंगे बचपन से मिलकर कुछ समय के लिए मैं भूल गई कि मैं कहां हूं और उसे ऐसे समेटने लगी जैसे कि अब ये फिर से मुझे कभी नहीं मिल पाएगा।     अब अपनी इस हरकत पर मुझे थोड़ी शर्म भी आ रही है क्योंकि जिन लोगों ने मुझे देखा होगा उन्होंने मुझे पक्का भूखी भीखारन समझा होगा क्योंकि उन्हें मैं ऐसे समेट रही थी जैसे की भंडारे में हलवा इकट्ठा कर रही हूं कि थोड़ी ही देर में ये खतम हो जाएगा इसलिए जल्दी से ले लो। इसी सोच से मैंने एक नहीं दो नहीं बल्कि जितनी भी उस डिब्बे में बची थी सब अपनी गाड़ी में भर ली।   खैर, छोड़ो! किसी ने चाहे जैसा भी सोचा हो सच तो यह है कि बचपन तो हर किसी का निराला ही होता है और उससे जुड

मजेदार यात्रा या जाम की उलझन...

Image
मजेदार यात्रा या जाम की उलझन... पिछले रविवार को रुड़की जाना हुआ और वो भी बच्चों के साथ। लंबे समय के बाद बच्चों की दूसरे शहर जाने की पहली यात्रा थी इसलिए बच्चे तो अपनी पूरी मस्ती में होंगे ही। उनके लिए तो यात्रा का कारण चाहे कुछ भी हो उद्देश्य तो पिकनिक पर जाने वाला होता है लेकिन बच्चों के साथ मेरे लिए भी ये एक नया अनुभव था क्योंकि मैं भी बहुत समय के बाद इस तरफ जा रही थी। सुना था कि दिल्ली जाते समय डाट काली मंदिर के पास अब जाम नहीं लगेगा क्योंकि अब दिल्ली जाने के लिए मंदिर के साथ एक नई डबल लेन टनल का निर्माण हो चुका है। जहां पहले सहारनपुर या दिल्ली जाते समय डाट काली की पुरानी सुरंग में कई बार जाम में फंसना पड़ता था वहीं अब डबल लेन में सरपट आगे बढ़ा जा सकता है।    चूंकि हम लोग हिंदू हैं तो रास्ते में आने वाले सभी मंदिरों में सिर अपने आप ही झुक जाता है इसीलिए इस रास्ते के जाम का तो पता नहीं लेकिन मंदिर के आगे से गुजरना जरूर याद आया।      डाट काली मंदिर 2011     खैर, मोहंड के जंगलों से आगे निकलकर बिहारीगढ़ के पकौड़े भी याद आए लेकिन हाइवे की शानदार सड़क पर गाड़ी ने

कंजूसी, बचत या मेरा आलस

Image
कंजूसी, बचत या मेरा आलस    शायद पिछले हफ्ते भर से इस टूथपेस्ट को फेंकने की सोच रही हूं लेकिन हिम्मत ही नहीं हो रही। क्योंकि जितनी बार इसके ढक्कन को खोलकर इस पेस्ट को यहां वहां पिचकाकर और तोड़ मरोड़ करती हूं उतनी बार ये पेस्ट डस्टबीन में जाने से बच जाता है और हर बार इसमें से मेरे ब्रश लायक तो टूथ पेस्ट निकल ही जा रहा है। प्रतिदिन मैं उत्सुकता और संशय दोनों के साथ सोचती हूं कि "क्या आज इस ट्यूब से टूथपेस्ट निकलेगा??" और वो झट से मुस्कुराता हुआ ट्यूब से निकलकर मेरा भ्रम तोड़ देता है।      हफ्ते भर से यही सोचती रही कि इस ट्यूब को फेंक दूंगी और स्टोर रूम से नया दातुन निकाल लूंगी लेकिन हर एक सुबह फिर से ख्याल आता है कि एक बार और मोड़कर देख लेती हूं अगर पेस्ट निकला तो ठीक है नहीं तो रात को तो नया रख ही लूंगी लेकिन नया रखने की नौबत तो आ ही नहीं रही।  बस थोड़ी सी कोशिश और ब्रश के मुखड़े पर लाली सज गई। लगता है, हर सुबह ही क्या हर रात में भी मेरे ब्रश का साथी बनने की जिद्द में है।     दो तीन दिन पहले तो लगा कि इस ट्यूब में पेस्ट कब खत्म हो जाए पता नहीं लेकिन अब उम्मीद बंध ग

5 सितंबर.. शिक्षक दिवस (Teachers Day)" मैं बड़ा होकर शिक्षक बनूंगा!!"

Image
5 सितंबर.. शिक्षक दिवस (Teachers Day) " मैं बड़ा होकर शिक्षक बनूंगा!!"   "मैं बड़ा होकर एक शिक्षक बनूंगा।" ऐसा आजकल बहुत कम ही सुनने को मिलता है।क्या आपने भी ऐसा किसी बच्चे के मुंह से सुना है कि वह बड़ा होकर एक शिक्षक बनना चाहता है?? शायद नहीं। आज हर बच्चे को डॉक्टर बनना है, इंजीनियर बनना है, पायलट बनना है, वकील बनना है, सैनिक बनना है, बैंकर बनना है, अफसर बनना है लेकिन शिक्षक नहीं!! और अगर किसी बच्चे को बनना भी है तो वो भी केवल किसी शिक्षक के प्रति मोह होगा जो कुछ समय के बाद गायब हो जाता है। उस बच्चे को अक्षर ज्ञान कराने वाले सबसे पहले एक शिक्षक ही होता है पर ऐसा क्यों है कि उसे अब शिक्षक नहीं बनना होता। शायद उसे शिक्षक की नौकरी में किसी प्रकार का आकर्षण नहीं लगता या घर परिवार की मंशा अन्य क्षेत्रों में जाने की हो या फिर आजकल के शिक्षकों की स्थिति ऐसी है कि कोई बच्चा भविष्य में शिक्षक बनने की कल्पना करना ही नहीं चाहता। या फिर आज का विद्यार्थी और आज का शिक्षक दोनों बस अंकों के फेर तक ही सीमित हो चुके हैं इसीलिए कुछ कल्पना परिकल्पना से दूर ही हैं।       आज