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Showing posts from March, 2021

उत्तराखंड में मकर संक्रांति और पकवान

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उत्तराखंड में मकर संक्रांति का खानपान      नए वर्ष के आरंभ होते ही पहला उत्सव हमें मकर संक्रांति में रूप में मिलता है। इस संक्रति में सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है इसलिए इसे मकर संक्रांति कहते हैं। इसको उत्तरायणी भी कहा जाता है क्योंकि सूर्य दक्षिण दिशा से उत्तर की दिशा की ओर आता है। इसलिए आज से दिन लंबे और रात छोटी होने लगती है।  मकर संक्रांति का महत्व:   मकर संक्रांति का महत्व हिंदू शास्त्र में इसलिए भी है क्योंकि सूर्य देव अपने पुत्र जो मकर राशि के स्वामी हैं शनि से मिलते हैं जो ज्योतिषी विद्या में महत्वपूर्ण योग होता है। इसलिए माना जाता है कि इस योग में स्नान, ध्यान और दान से पुण्य मिलता है। वैसे इस दिन भगवान विष्णु की भी पूजा की जाती है क्योंकि कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने इस दिन मधु कैटभ दानवों का अंत किया था।    मकर संक्रांति से ही शुभ कार्यों का आरंभ भी हो जाता है क्योंकि उत्तरायण में हम 'देवों के दिन' और दक्षिणायन में हम रात मानते हैं इसलिए मांगलिक कार्यों का आरंभ आज से हो जाता है।    यहां तक कि माना जाता है कि उत्तरायण में मृत्यु से श्री चरणों में म

कुंभ मेला: भारत की प्राचीन संपन्न संस्कृति Kumbh Mela: An ancient rich culture of India

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  कुंभ मेला: भारत की प्राचीन संपन्न संस्कृति  Kumbh Mela: An ancient rich culture of India    कुंभ मेला कितना प्रसिद्ध है इसे किसी भी भारतीय को पूछने की आवश्यकता ही नहीं है, यहां तक कि किसी हिंदू से यह पूछना भी व्यर्थ है कि कुंभ मेले का क्या महत्व है, क्योंकि वह अपने जीवन में मोक्ष, पुण्य और पापमुक्ति के लिए जीवन में एक बार कुंभ स्नान अवश्य करना चाहता है। हां, ये अवश्य पूछा जा सकता है कि क्या आज के समय में लोग कुंभ नगरी का भ्रमण करने में इच्छुक हैं? चूंकि मैं देवभूमि उत्तराखंड से हूं तो मेरी तीव्र इच्छा तो है ही कि मैं भी इस बार के कुंभ मेले में जाऊं , हालांकि मैंने 2010 के कुंभ में गंगा स्नान का पुण्य हरिद्वार न जाकर ऋषिकेश में ही ले लिया था क्योंकि उस समय कुंभ स्नान योग ऋषिकेश तक बना हुआ था। इस समय 2022 में फिर से हरिद्वार में महाकुंभ का आयोजन हो रहा है और इन 12 वर्षों के बाद एक बार फिर से तीव्र इच्छा हो रही है कि इस बार हरिद्वार जाकर ही कुंभ मेले का आनंद लूं और वहां की रौनक और रंगत का अनुभव भी कर सकूं लेकिन महामारी का एक बार फिर से बढ़ना मेरी हिम्मत को पीछे तो धकेल रहा

होली के रंग भरे अंदाज... हैप्पी होली 2021(Happy Holi 2021)

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होली के रंग भरे अंदाज... हैप्पी होली 2021     त्योहार मतलब खुशी, उमंग, उत्साह, प्रेम, सदभाव, मेल जोल, गीत-संगीत और तरह तरह के पकवान। त्योहार के ये आशय सिर्फ भारत में ही नहीं अपितु दुनियाभर में भी यहीं है लेकिन जो रौनक और रंगत भारत में है वो शायद ही दुनिया के अन्य देशों में मिले। यहाँ पर जितनी भाषा बोली संस्कृतियां है उतने ही त्यौहार और उत्सव हैं। भारत देश में तो जैसे ऋतुयें बदलती हैं वैसे ही त्यौहार आते जाते हैं। सूर्य  और चंद्र की दशाओं और दिशाओं में उत्सव, कहीं फसल बुआई पर तो कहीं फसल कटाई पर उत्सव, कभी प्रकृति के बसंत पर तो कभी सावन पर उत्सव, कभी ईश्वर के जन्म का उत्सव तो कभी रावण जैसे राक्षस के वध का उत्सव,कभी भाई बहन के प्रेम का उत्सव तो कभी पति के सुहाग का उत्सव और कभी देश की आज़ादी और कानून का पर्व । यहाँ तक कि ईश्वर की भक्ति और व्रत भी यहाँ उत्सव का प्रतीक होते हैं । मुझे तो लगता है कि हिंदुस्तान का नाम ' उत्सवस्थान' रख लेना चाहिए। यहाँ तो लगता है कि बस कोई मौका आना चाहिए और उत्सव त्यौहार के रूप में प्रकट हो जाता है।  जीवन में महत्व    खैर! उत्सव का अर्थ ह

हाँ! मैं नारी हूँ।।

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हाँ! मैं नारी हूँ।।  हंसती हूं, रोती हूँ, गाती हूँ मुस्कुराती हूँ,  खेलती हूँ, नाचती हूँ, सजती संवरती हूँ कभी दर्पण से लजाती हूँ,  हाँ! मैं नारी हूँ।  गिरती हूँ, संभलती हूँ, कभी हँसते-हँसते टूट जाती हूँ,  झूझती हूँ अपने से, अपनों से लड़ती हूँ, लेकिन प्यार से मनाती हूँ,  हाँ! मैं नारी हूँ।  थकती हूँ, जलती हूँ, दबती हूँ,  फिर भी तप कर निखरती हूँ,  हाँ! मैं नारी हूँ। नागफनी हूँ तो कभी बसंती हूँ, कभी रंभा तो कभी काली बनती हूँ,  जाने कितने रंग घुले, कितने भावों की अभिव्यक्ति हूँ,  हाँ! मैं नारी हूँ।।  हाँ! मैं नारी हूँ।।  एक-Naari

मेरी कल्पना के शिव और मैं

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 मेरी कल्पना में शिव और मैं...    चूंकि कल ही महाशिवरात्रि का पर्व था और इस पर्व में मंदिरों विशेषकर शिवालयों में अत्यधिक भीड़ होती है। हर वर्ष तो शिवलिंग में जल चढ़ा दिया जाता है लेकिन इस वर्ष कोरोना के डर के कारण धर्म कर्म में थोड़ा पीछे हटना पड़ा। सो घर पर व्रत लेकर ही संतोष करना पड़ा। मैं आस्तिक तो हूँ लेकिन शायद आध्यात्मिक उतनी नहीं हूँ और अब जब हर कोई शिवमय हो गया है तो यह मेरे लिए भी एक ऐसा अवसर था जिसमें मैंने बिना मंदिर गए थोड़ा शिव चिंतन भी कर लिया। हालांकि मेरे लिए यह कार्य थोड़ा कठिन था तभी तो दो बार कोशिश की कि कुछ लिखा जाए लेकिन हार कर छोड़ दिया क्योंकि मैंनें तो हमेशा शिव का पूजन किया था कभी उसका चिंतन नहीं। तीसरी बार हिम्मत करके थोड़ा लिख पाई हूँ, शायद आप में से कुछ लोगों के विचार मुझसे भिन्न हो लेकिन यह सिर्फ मेरी परिकल्पना मात्र ही है। (Albert Einstein: Imagination  is more important than knowledge)      हम सभी शिव को पूजते हैं, शिव जैसा दिखना चाहते है, शिव जैसा बनना चाहते हैं लेकिन उसका आकार कोई नहीं । शिव जैसा जोगी तो बन जाते हैं लेकिन शिव जैसा योगी नही

8 मार्च, अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस... (दिन स्वयं को पहचानने का) March 8, International Women's Day ... (Day to identify oneself)

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8 मार्च, अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस... (दिन स्वयं को पहचानने का)      बचपन में मुझसे पूछा जाता था कि मेरे नाम का अर्थ क्या है और मैं बस झेंप के मुस्कुरा देती और चुपचाप चली जाती थी। हमारे पड़ोस के एक अंकल अध्यापक थे और मुझे अमूमन चिढ़ाते भी थे कि मेरी सभी बहनों के नाम का अर्थ बहुत ही सुंदर है लेकिन 'रीना' नाम का कोई अर्थ नहीं होता है। मुझे थोड़ा बुरा भी लगता था कि मेरी बहनों के इतने सुंदर नाम है लेकिन मेरा नाम अच्छा नहीं है। उस समय भी मैं यही सोचती थी कि इसका मतलब आखिर होता क्या है बस एक यही ख्याल आता था कि उस समय एक प्रसिद्ध अभिनेत्री का नाम 'रीना रॉय' था शायद इसीलिए मेरा नाम भी उन्हीं के नाम पर रख दिया होगा। उस समय 'गूगल बाबा' भी तो हर जगह उपलब्ध नहीं थे, या यह कहें कि गूगल तक पहुँचने की हमारी क्षमता भी नहीं थी। आज तो बच्चे के नामकरण में पंडित जी के बताने से पहले ही गूगल से नाम और उसका अर्थ दोनों पूछ लिए जाते है। नामकरण तो दूर की बात है, अब तो बच्चे के जन्म से पहले ही गूगल का सहारा ले लिया जाता है।      अब जब समय इतना आगे बढ़ गया है तो समय के साथ अब