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Showing posts from October, 2020

उत्तराखंड में मकर संक्रांति और पकवान

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उत्तराखंड में मकर संक्रांति का खानपान      नए वर्ष के आरंभ होते ही पहला उत्सव हमें मकर संक्रांति में रूप में मिलता है। इस संक्रति में सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है इसलिए इसे मकर संक्रांति कहते हैं। इसको उत्तरायणी भी कहा जाता है क्योंकि सूर्य दक्षिण दिशा से उत्तर की दिशा की ओर आता है। इसलिए आज से दिन लंबे और रात छोटी होने लगती है।  मकर संक्रांति का महत्व:   मकर संक्रांति का महत्व हिंदू शास्त्र में इसलिए भी है क्योंकि सूर्य देव अपने पुत्र जो मकर राशि के स्वामी हैं शनि से मिलते हैं जो ज्योतिषी विद्या में महत्वपूर्ण योग होता है। इसलिए माना जाता है कि इस योग में स्नान, ध्यान और दान से पुण्य मिलता है। वैसे इस दिन भगवान विष्णु की भी पूजा की जाती है क्योंकि कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने इस दिन मधु कैटभ दानवों का अंत किया था।    मकर संक्रांति से ही शुभ कार्यों का आरंभ भी हो जाता है क्योंकि उत्तरायण में हम 'देवों के दिन' और दक्षिणायन में हम रात मानते हैं इसलिए मांगलिक कार्यों का आरंभ आज से हो जाता है।    यहां तक कि माना जाता है कि उत्तरायण में मृत्यु से श्री चरणों में म

क्या आदमी और औरत समान हैं?

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         वैसे तो मैं 'क्रांतिवीर की कलमवाली बाई' नहीं हूँ जो अपने हक के लिए लडूं।क्योंकि ईश्वर ने मुझ पर हमेशा अपनी कृपा बनाई है। हां, ये जरूर है कि कभी कभी अपने से और कभी ईश्वर से कुछ शिकायत करने का फिर भी सोच ही लेती हूँ।      ये आदमी लोग भी ना अपना 'enjoyment' कर ही लेते हैं चाहे किसी का जन्मदिन हो या फिर किसी का मरणदिन। चाहे किसी की शादी हो या फिर किसी की बर्बादी। 'Situation' चाहे कोई भी हो, कैसी भी हो, बस कुछ ना कुछ जुगाड़ तो कर ही लेते है अपने थकान को दूर करने का।    ऐसा गुण ईश्वर ने हम औरतों को क्यों नही दिया कि हर हालात में भी हम अपने लिए समय निकाल ले। चाहे लाख कष्ट हो जिंदगी में, अनगिनत तनाव हो, घर परिवार की चिंता हो, या सामने कोई बड़ा सा दुखों का पहाड़ क्यों ना हो, लेकिन आदमी फिर भी समय निकालता है अपने लिए, फिर चाहे दोस्त के साथ हो, पत्नी के साथ हो, दारू के साथ हो, सोशल साइट के साथ हो या फिर क्रिकेट मैच के साथ हो।     लेकिन हम औरतों के हिस्से में समय निकालने के लिए सिर्फ और सिर्फ घर परिवार, बच्चे, शिक्षा, खाना बस यही सब रहता है। सारी चीज़ो

नवरात्र में शक्ति पूजन और उसके बाद....

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               साल में दो बार आने वाले नवरात्र हर किसी को कितनी सकारात्मकता और ऊर्जा दे जाते हैं, इसका अनुभव तो आपने भी किया होगा। नवरात्र चाहे चैत्र के हो या शारदीय, हर छः माह में आने वाले ये नौ दिन आगे आने वाले दिनों के लिए हमे नई आशा और ऊर्जा से भर देते हैं। इन नौ दिनों का समय चाहे कोई भी हो किंतु एक बात बड़ी ही सामान्य है और वह ये है कि इन नौ दिनों के बाद आपको मौसम बदला बदला सा मिलेगा। जैसे चैत्र के नवरात्र के साथ ग्रीष्म ऋतु का आना और शारदीय नवरात्र के साथ शरद ऋतु का आना। ऐसा लगता है कि ईश्वर हमें संदेशा देता है कि हम इन नौ दिनों में ध्यान, तप, सात्विकता से  तैयार हो जाए प्रकृति के अनुरूप अपने को ढालने के लिए।      पूरे साल भर भले ही ईश्वर के आगे ना खड़े हों लेकिन नवरात्री में तो कोई विरला ही होगा जो माता के आगे हाथ जोड़े खड़ा ना मिला हो। हर किसी का शीश झुका होता है एक मूर्ति, एक फोटो, एक कागज के सामने और अगर कहीं भी नहीं गए तो भी मन ही मन तो माँ का सुमिरन तो होता ही है। कहने का अभिप्राय सिर्फ यही है कि हम किसी ना किसी रूप में आदि शक्ति को नमन तो अवश्य ही करते हैं। अब

जिद्दी बेलें...

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जिद्दी बेलें      आज एक बार फिर मुझे अपने घर के पीछे वाली गैलेरी में जाना पड़ा। आज फ़िर से ये लहरा लहरा कर मुझे चिड़ा रहीं हैं। अभी एक हफ्ते पहले ही तो ये मिलीं थी मुझसे। अकड़ीं अकड़ीं सी पतले छरहरे बदन वाली आगे से गोल घुंडिनुमा ताज लिए बढ़ी चले जा रही थी मेरी दीवार पर,ये जिद्दी बेल। इन्हे देख कर लग रहा था की जैसे कोई दुश्मन मेरे किले पर चढ़ाई कर रहा हो और कब्जा करना चाह रहा हो ।      आपको तो याद होगा कि  'खोया पाया तौलिया' में मैंने बताया था कि मेरे घर के पीछे एक गैलेरी है और उसी गैलेरी के पीछे एक खाली प्लॉट है जहाँ हमारे एक पड़ोसी अपनी क्यारी बनाते हैं और बागवानी करते हैं। इसी गैलेरी में घर का कुछ सामान भी है, जैसे कुछ लकड़ी के गुटके, घर बनाते हुए बची हुई फर्श की  टाईल्स, LPG गैस, और मेरी वाशिंग मशीन। और समान को छोड़ भी दे लेकिन वाशिंग मशीन की सहायता तो मुझे हर हफ्ते चाहिए होती है और कभी कभी एक हफ्ते में दो बार भी मैं इसकी सेवाएं ले लेती हूँ।   अभी एक हफ्ते पहले की ही बात है, सुबह वाशिंग मशीन में कपड़े डाले, और कुछ ही देर में मैंने कुछ कपड़ो को सुखाने के लिए गैले

पहाड़ी लूण/पिस्यूं लूण

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पहाड़ी लूण          ये लेख आपको उत्तराखंड के देसी नमक का तीखा स्वाद बताएगा, अगर आपने इस नमक का स्वाद नही लिया तो एक बार पढ़ कर स्वाद जरूर लें।।    वैसे इन दो शब्दों से तो हर किसी को पता ही चल गया होगा की यह 'लूण' एक नमक ही है, क्योंकि नमक को अन्य बोलियो में भी लूण ही कहा जाता है। ये दो शब्द उन लोगों के कानों के लिए तो बिल्कुल भी नया नही है जिनका संबंध पहाड़ से है। पहाड़ी लूण का मतलब, पहाड़ में पाया जाने वाला नमक ही है, पहले ये साधारण नमक, डलो में मिलता था इसे यहाँ के गढ़वाली लोग 'गारू लूण' कहते थे लेकिन मैं जिस नमक के विषय में बताना चाह रही हूँ वह कोई मामूली नमक नही अपितु " पिस्यूं लूण " है।            अब तो पिस्यूं लूण का मतलब वही समझ सकता है जिसने 'उत्तराखंड का नमक' खाया हो। और इसका तो सिर्फ नाम ही काफी है मुँह में पानी लाने को, क्योंकि इसको सुनते ही, बड़ा सा खीरा, बड़े बड़े लिम्बा, चकोतरा, गाजर, मूली, कच्मोली, मंडुआ रोटी और ना जाने ऐसे अनगिनत फल और सब्जी याद आ जाते हैं जिनका स्वाद पिस्यूं लूण के बिना अधूरा है। अब थोड़ा ये भी बताया जाय