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Showing posts from May, 2022

गर्मी में प्रभु का धन्यवाद!!

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गर्मी में प्रभु का धन्यवाद!!    हम लोग न शिकायत बहुत करते हैं। कभी अपनो से तो कभी अपने आप से और जब कभी कुछ नहीं सूझता तो भगवान से ही शिकायत कर लेते हैं क्योंकि यहां तसल्ली मिलती है कि कोई सुने या न सुने लेकिन मेरा भगवान तो जरूर सुनेगा। अब इसे हम शिकायत समझे या फिर अपनी इच्छाएं ये तो भगवान ही जाने हम तो बस भगवान के तथास्तु की इच्छा रखते हैं लेकिन अपनी इच्छाओं के साथ आगे बढ़ते बढ़ते उस ईश्वर का धन्यवाद देना भी भूल जाते हैं जिसने हमेशा सहारा दिया है।       वैसे तो ईश्वर के आगे हम सभी नमन करते हैं लेकिन कभी कभी उसकी कृपा देर से समझ आती है। अभी पिछले शनिवार की ही बात है जब मुझे भी इस बात का अनुभव हुआ कि चाहे जो भी दिया है जितना भी दिया है उसके लिए ईश्वर का धन्यवाद है।    पिछले हफ्ते ही ऋषिकेश जाना हुआ लेकिन बिना अपनी गाड़ी के। काफी समय गुजर गया है किसी भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सेवाएं लेते हुए । कहीं भी जाना हो चाहे पास का सफर हो या दूर का अब अधिकतर अपना वहां ही प्रयोग होता है। भीड़भाड़ वाली जगह हो तो दुपहिया नहीं तो अपनी गाड़ी से ही चल पड़ते हैं। और जब न अपनी दुपहिया हो और न ही

गर्मी में प्रभु का धन्यवाद!!

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गर्मी में प्रभु का धन्यवाद!!    हम लोग न शिकायत बहुत करते हैं। कभी अपनो से तो कभी अपने आप से और जब कभी कुछ नहीं सूझता तो भगवान से ही शिकायत कर लेते हैं क्योंकि यहां तसल्ली मिलती है कि कोई सुने या न सुने लेकिन मेरा भगवान तो जरूर सुनेगा। अब इसे हम शिकायत समझे या फिर अपनी इच्छाएं ये तो भगवान ही जाने हम तो बस भगवान के तथास्तु की इच्छा रखते हैं लेकिन अपनी इच्छाओं के साथ आगे बढ़ते बढ़ते उस ईश्वर का धन्यवाद देना भी भूल जाते हैं जिसने हमेशा सहारा दिया है।       वैसे तो ईश्वर के आगे हम सभी नमन करते हैं लेकिन कभी कभी उसकी कृपा देर से समझ आती है। अभी पिछले शनिवार की ही बात है जब मुझे भी इस बात का अनुभव हुआ कि चाहे जो भी दिया है जितना भी दिया है उसके लिए ईश्वर का धन्यवाद है।    पिछले हफ्ते ही ऋषिकेश जाना हुआ लेकिन बिना अपनी गाड़ी के। काफी समय गुजर गया है किसी भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सेवाएं लेते हुए । कहीं भी जाना हो चाहे पास का सफर हो या दूर का अब अधिकतर अपना वहां ही प्रयोग होता है। भीड़भाड़ वाली जगह हो तो दुपहिया नहीं तो अपनी गाड़ी से ही चल पड़ते हैं। और जब न अपनी दुपहिया हो और न ही

Hotel & Hospitality: एक विशाल परिवार!!

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Hotel & Hospitality: एक विशाल परिवार!!    मेरे फोन में केवल 30% नंबर ही मेरे अपने घर परिवार और दोस्त के हैं। बाकी बचे लगभग 70% नंबर तो होटल और हॉस्पिटैलिटी से जुड़े लोगों के है। इसे देखकर लगता है कि अपने परिवार से बड़ा तो ये होटल और हॉस्पिटैलिटी का परिवार है जहां नित नए लोग मुझसे जुड़ते चले जा रहे हैं और ऐसा ही हाल उन सभी लोगों का भी है जो इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं।    सच कहती हूं 11 साल पहले जो होटल और हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र से क्या जुड़ी, मुझे लग रहा है कि आज तक नए लोगों से जुड़ रही हूं। सीमित परिवार के साथ सीमित मोबाइल नो. लेकिन इस विशाल क्षेत्र से जुड़ने का मतलब मेरे व्यवसायिक परिवार का अपने आप विशाल हो जाना है।     होटल और रेस्टोरेंट उद्योग अपने आप में इतना विशाल है कि रोज कितने ही नए लोग इससे जुड़ते चले जा रहे हैं और एक परिवार की तरह आपस में बंधे जाते हैं क्योंकि जैसे हमारी दुनियां गोल है वैसे ही होटल और रेस्टोरेंट की दुनिया भी गोल है जहां सभी लोग अपना अपना काम करते हुए आपस में जुड़ते चले जाते हैं और किसी न किसी छोर पर आपस में मिल भी जाते हैं।     भले