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Showing posts from October, 2021

जंगल: बचा लो...मैं जल रहा हूं!

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जंगल: बचा लो...मैं जल रहा हूं!    इन दिनों हर कोई गर्मी से बेहाल है क्या लोग और क्या जानवर। यहां तक कि पक्षियों के लिए भी ये दिन कठिन हो रहे हैं। मैदानी क्षेत्र के लोगों को तो गर्मी और उमस के साथ लड़ाई लड़ने की आदत हो गई है लेकिन पहाड़ी क्षेत्र के जीव का क्या उन्हें गर्मी की आदत नहीं है क्योंकि गर्मियों में सूरज चाहे जितना भी तपा ले लेकिन शाम होते होते पहाड़ तो ठंडे हो ही जाते हैं। लेकिन तब क्या हाल हो जब पहाड़ ही जल रहा हो?? उस पहाड़ के जंगल जल रहे हो, वहां के औषधीय वनस्पति से लेकर जानवर तक जल रहे हों। पूरा का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र संकट में हो!! उस पहाड़ी क्षेत्र का क्या जहां वन ही जीवन है और जब उस वन में ही आग लगी हो तो जीवन कहां बचा रह जायेगा!!      पिछले कुछ दिनों से बस ऐसी ही खबरें सुनकर डर लग रहा है क्योंकि हमारा जंगल जल रहा है। पिछले साल इसी माह के केवल पांच दिनों में ही जंगल की आग की 361 घटनाएं हो चुकी थी और इसमें लगभग 570 हेक्टेयर जंगल की भूमि का नुकसान हो चुका था। और इस साल 2022 में भी 20 अप्रैल तक 799 आग की घटनाएं सामने आ चुकी हैं जिसमें 1133 हेक्टेयर वन प्रभ

उत्तराखंड का मंडुआ/ कोदा/ क्वादु/ चुन

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उत्तराखंड का मंडुआ/ कोदा/ क्वादु/ चुन    सर्दियों की गुलाबी ठंड शुरू हो चुकी है। घर के दीवान, संदूक या अलमारी से गर्म कपड़ों का छत या बालकनी में धूप लगाना भी शुरू हो चुका है और साथ ही पहनना भी। कपड़े ही क्या हमारा खानपान में भी बहुत से बदलाव होने लगे है। ठंडे शरबत या शेक्स की जगह गर्म सूप और चाय कॉफी ने ले ली है। ठंडी तासीर के बजाए गर्म तासीर वाले व्यंजनों को रसोई में ज्यादा जगह मिल रही है और साथ ही मोटे अनाज का सेवन भी बढ़ रहा है।    और अगर बात उत्तराखंड की हो तो सर्दियों के आरंभ के साथ ही मोटा अनाज कहे जाने वाले उत्तराखंड के पारंपरिक अनाज का काला राजा मंडुआ/ कोदा/ क्वादु/ चून का उपभोग अधिक होने लगता है।        मंडुआ जिसे हम फिंगर मिलेट  कहते हैं। इसे रागी के नाम से अधिक पहचाना जाता है। वैसे इसका वैज्ञानिक नाम एलिसाइन कोराकाना है। मुख्यरूप से कोदा यूगांडा और इथोपिया का मोटा अनाज है। लगभग 3 से 4000 वर्ष पूर्व यह भारत आया और अब भारत विश्व का सबसे अधिक मंडुआ उत्पादन करने वाला देश हो चुका है। उड़ीसा, तमिलनाडु, महाराष्ट्र के साथ साथ उत्तराखंड में भी इसकी खेती की जाती है।   मंड

करवा चौथ में चूड़ियों का संसार...

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करवा चौथ में चूड़ियों का संसार...        रंग बिरंगी चूड़ियों के संसार में एक बार अगर महिलाएं घुस जाएं तो उनका वहां से बाहर आना बहुत मुश्किल हो जाता है क्योंकि ये पहले से ही हमेशा आकर्षण का केंद्र रही हैं। महिलाओं के लिए ये चूड़ियां केवल श्रृंगार ही नहीं अपितु सुहाग का प्रतीक भी हैं।     कलाइयों की शोभा इन्हीं सुंदर सुंदर चूड़ियों से होती है जो वैदिक काल से ही स्त्रियों की पसंद है लेकिन चूड़ियों को सुहाग का प्रतीक मध्यकालीन से माना गया। तभी तो करवाचौथ में चूड़ियां खूबसूरती बढ़ाने के साथ सुहाग का द्योतक भी होता है।      हड़प्पा व मोहनजोदड़ो की खुदाई से जो प्रमाण प्राप्त हुए हैं उनसे ज्ञात होता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के लोग अपनी कलाई में धातु से बना कंगन जैसा कोई आभूषण पहनते थे।     लाल, हरी, नीली, गुलाबी, पीली या सुनहरी किसी भी रंग की चूड़ियां हो बस कलाइयों में जाते ही सब रंग एक से बढ़कर एक लगते हैं।     चूड़ी बिना श्रृंगार अधूरा और श्रृंगार बिना करवा चौथ अधूरा। करवाचौथ के त्योहार में सुहागिन स्त्रियां केवल स्वयं ही नई नई चूड़ियां ही नहीं पहनती अपितु अन्य सुहागिन

गायब होता संतोष ...

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गायब होता संतोष...   मजदूरों की झोपड़ी से गाने की आवाज आई और उस भजन को सुनते ही कुछ याद आया। बस फिर क्या था ! फिल्म तो याद आई ही साथ ही माता का यह रूप भी याद आया।    बहुत सालों पहले एक फिल्म आई थी 'जय संतोषी मां' । ये उस समय की शोले जैसी फिल्म की तरह ही ब्लॉक बस्टर थी। जब लोग इस फिल्म को देखने सिनेमा हाल जाते थे तब अपने जूते चप्पल भी बाहर उतारते थे और जब फिल्म में माता संतोषी का आगमन होता था तो फूल और सिक्के भी पर्दे की ओर उछालते थे।     और जब 'जय संतोषी मां' फिल्म दूरदर्शन पर आई तो लोग हाथ जोड़े फिल्म को देख रहे थे और जैसे ही माता के दर्शन होते सभी जय संतोषी माता के नारे लगाते। इस फिल्म में तो साधारण से किरदार निभाने वाले अभिनेताओं को भी खूब प्रसिद्धि मिली।    चित्र आभार: गूगल     हालांकि माता संतोषी की पूजा अर्चना मुख्यत: उत्तर प्रदेश में ही की जाती थी लेकिन इसके बाद उनकी महिमा से कोई अछूता नहीं रहा और उसके बाद क्या उत्तर और क्या दक्षिण। माता संतोषी की पूजा पूरे देश में होने लगी।    घर की सुख, शांति, समृद्धि और मनोकामना पूर्ण करने के लिए 16 शुक

उत्तरकाशी यात्रा: तीन घंटों में तीन तीर्थ

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उत्तरकाशी यात्रा: तीन घंटों में तीन तीर्थ     लक्ष्य लेकर काम करो तो जरूर पूरा होता है।।    देहरादून से उत्तरकाशी की दूरी लगभग 145 किमी है और हमें एक ही दिन में लौटा फेरी करनी थी इसीलिए सुबह 6 बजे निकलने की सोची ताकि 11 या 11:30 बजे तक उत्तरकाशी पहुंचा जा सके और हम सुबह 6:15 बजे के आसपास तैयार भी हो गए लेकिन जैसे ही गाड़ी में बैठने को हुए तो देखा कि आगे का टायर तो पंचर है। अब बाकी का काम तो विकास का ही था तो बिना देरी किए विकास मैकेनिक के किरदार में आ गए। वैसे मैकेनिक ही क्या वो तो घर या ऑफिस के भी छोटे मोटे काम करते हुए कभी इलेक्ट्रीशियन तो कभी प्लंबर भी बन जाते हैं।    मैकेनिक तो जैसे भी हो लेकिन सुबह सुबह उस इंसान की वर्जिश तगड़ी हो गई जिसने कभी कसरत का 'क'   भी न जाना हो। खैर! 45 मिनट के बाद आखिर घर से निकल ही गए। गाड़ी में बैठकर सोच रही थी कि अपना लक्ष्य तो बना लो लेकिन आगे आने वाली अनचाही और अप्रयाशित  (unpridict) चुनौतियों का क्या??    आज के सफर में पिछले साल के दिसंबर की याद ताजा हो गई जब हम हर्षिल गए थे क्योंकि हमें रास्ता वही पकड़ना था तो उसी

गांधीवादी से गांधीगिरी तक!!

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गांधीवादी से गांधीगिरी तक!!   गांधी जी के बारे में इतना लिख और पढ़ चुके हैं लोग कि अब और कुछ बचा नहीं है बताने को तभी तो आज अगर पूछा जाए कि ऐसा कौन है जो गांधी को सुनना, देखना या पढ़ना पसंद करता हो तो जवाब में बहुत कम ही लोग हामी भरेंगे। उनके विषय में आज शायद सबके अपने अपने विचार और तर्क होंगे लेकिन राष्ट्रपिता तो वही हैं।    अब भले ही लोग गांधी से प्रेम करें या न करें लेकिन गांधी जयंती से प्रेम तो करते ही हैं क्योंकि इस दिन अवकाश का आनंद जो मिलता है और अवकाश का आनंद तो दोगुना तब हो जाता है जब अगले दिन भी शनिवार या रविवार हो।    इस बार भी ऐसा ही योग बना है कि अब छुट्टी का मजा दो दिन तक रहेगा लेकिन क्या हम भी गांधी जयंती में गांधी जी को याद करेंगे?? ये भी सोचना पड़ेगा न!!     आज समय के साथ भले ही बहुतों के मन से गांधीवादी विचार धुल रहे हों लेकिन उनकी अहिंसक छवि मिटी नहीं है और आज भी जब बच्चा उनके चित्र के सामने खड़े होकर पूछता है कि ये कौन है?? तो हमारे मुंह से एक सुर में निकलता है 'राष्ट्रपिता महात्मा गांधी'। इसलिए ये तो मानना ही पड़ेगा कि हमारे अंदर किसी कोने में ग