सावन विशेष: भगवान शिव के प्रिय कौन हैं? जानिए शिवजी को क्या सबसे अधिक प्रिय है
सावन विशेष: भगवान शिव के प्रिय कौन हैं? जानिए
शिवजी को क्या सबसे अधिक प्रिय है
सावन आये और शिव का नाम न हो!! ऐसा कैसा हो सकता है। जैसे सावन की बारिश से धरती का वातावरण साफ और शुद्ध हो जाता है वैसे ही सावन में शिव के नाम से ही मन भी निर्मल होने लगता है। सावन माह की बारिश में हर वनस्पति अपने वृद्धिकाल में होती है इसलिए धरती का कोना कोना हरियाली से भरा रहता है और जब प्रकृति अपने इस सुंदर रूप में होगी तो मन का चंचल होना स्वाभाविक है। ऐसे में जहां मन अस्थिर होता है वहीं सावन में मन को स्थिर और शांत रखने के लिए शिव का ध्यान किया जाता है। ऐसे में प्रकृति स्वयं हमारे मानसिक नियंत्रण एवं आध्यात्मिक विकास के लिए हमें भगवान शिव के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित करती है और फिर हम सभी भक्त भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा अर्चना में लग जाते हैं चूंकि प्रकृति स्वयं शिवा अर्थात पार्वती है जो शिव का ही भाग है इसलिए प्रकृति के साथ पूरा वातावरण ही शिवमय हो जाता है और हमारा मन भी शिव में लीन होने लगता है।
हिंदू धर्म में माना जाता है कि भगवान शिव को समर्पित इस विशेष काल में शिव नाम से ही मानव का कल्याण हो जाता है क्योंकि शिव नाम स्वयं ही गंगा के समान पवित्र है फिर ऐसे पवित्र श्रावण मास में शिव का पूजन, चिंतन, सुमिरन, तप, त्याग, अभिषेक, आराधना सभी विशेष फलदायी होते है लेकिन यह सब तो हमारे लिए है क्योंकि हमें शिव प्रिय हैं, वे हमारे आराध्य है और हम सभी शिव की कृपा पाना चाहते हैं लेकिन क्या हमें पता है कि शिव के प्रिय कौन है??
सच तो यह है कि शिव अत्यंत सरल है इसलिए हर एक जीव जो उनमें आस्था रखता है, चाहे सगुण रूप में या फिर चाहे निर्गुण रूप में , वे उन सभी का कल्याण करते हैं इसलिए शिव के प्रिय उनके सभी भक्त है। फिर भी ज्ञानी भक्त शिव के सबसे श्रेष्ठ है और उससे अधिक प्रिय उन्हें कोई नहीं है।
ऐसा स्वयं शिव महापुराण के ब्यालीसवे अध्याय में सती दाह के पश्चात प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान शिव से क्षमा याचना के बाद (सती खंड का श्रुतिफल) का व्याख्यान है जिसमें शिव बताते हैं कि "वह कर्म परायण मनुष्य मूर्ख है जो वेद, यज्ञ, दान और तप आदि से मुझे जानना चाहता है। इसी प्रकार तू केवल कर्म के द्वारा ही संसार सागर से तरना चाहता था। तेरा यह कर्म मुझे अच्छा न लगा और मैने तेरे यज्ञ का विध्वंस करा दिया। हे दक्ष! अब तू मुझे परमेश्वर मानकर बुद्धिपूर्वक ज्ञान परायण हो सावधानी से कर्म कर।"
इसमें एक संदेश तो साफ है कि केवल व्रत, तप, अभिषेक, पूजन, दान आदि करने से या फिर वेद शास्त्र को पढ़ लेने से ही आपको शिव की कृपा प्राप्त नहीं हो सकती जब तक की आपको सही और गलत का साधारण सा अंतर भी न ज्ञान हो! यहां ज्ञानी का अर्थ केवल यह नही है जिसे वेद शास्त्र का या फिर पढ़ने और लिखने का ज्ञान हो। यहां पर ज्ञान का अर्थ है आत्म ज्ञान से जहां व्यक्ति अपनी बुद्धि, शक्ति और विवेक का प्रयोग एक सही दृष्टिकोण के साथ करता है। वह ज्ञानी जो अपने ज्ञान का प्रयोग जीव कल्याण के लिये करता है। वह ज्ञानी जो न केवल बाहर से ही उत्तम हो बल्कि जिसका आचरण भी उत्तम हो। वह ज्ञानी जो शुद्ध विचार से अपने कार्य सिद्ध करता है, अहंकार, द्वेष, ईर्ष्या जैसी नकारात्मकता से परे रहता है और जो काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह से परे निश्छल भाव से उनका स्मरण करता है।
जिस प्रकार से प्रजापति दक्ष अश्वमेघ यज्ञ तो कर रहा था लेकिन अपने अहंकार, अपने क्रोध और अपने हठधर्म को अपने से दूर न कर सका फलस्वरूप उसका यज्ञ सफल न हुआ और साथ ही वह शिव के कोप का भागी भी हुआ। ठीक ऐसे ही धार्मिक कार्य या अनुष्ठान का पुण्य लेने के लिए अगर शिव का नाम लिया जाता है किंतु मन मलिन हो, अहंकार, द्वेष और दुर्भावनाओं से भरा हो तो शिव की गति प्राप्त होना असंभव हो जाता है।
भगवान शिव सरल हैं तभी तो भोले नाथ हैं और इसीलिए वे हमारे प्रिय भी हैं। अब बस भगवान शिव के प्रिय बनने का अवसर है जहाँ हम शिव की भांति ही सरल मन से उनकी आराधना करें। तो आइये इस श्रावण माह में शिव के प्रिय बनने का प्रयत्न करें। अज्ञानता को दूर करके ज्ञानी बनने का प्रयत्न करें और शिव की कृपा प्राप्त करें।
सावन की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
हर हर महादेव,,,!!
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