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सावन विशेष: शिव के प्रिय..

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सावन विशेष: भगवान  शिव के प्रिय कौन हैं?  जानिए   सावन आये और शिव का नाम न हो!! ऐसा कैसा हो सकता है। जैसे सावन की बारिश से धरती का वातावरण साफ और शुद्ध हो जाता है वैसे ही सावन में शिव के नाम से ही मन भी निर्मल होने लगता है। सावन माह की बारिश में हर वनस्पति अपने वृद्धिकाल में होती है इसलिए धरती का कोना कोना हरियाली से भरा रहता है और जब प्रकृति अपने इस सुंदर रूप में होगी तो मन का चंचल होना स्वाभाविक है। ऐसे में जहां मन अस्थिर होता है वहीं सावन में मन को स्थिर और शांत रखने के लिए शिव का ध्यान किया जाता है। ऐसे में प्रकृति स्वयं हमारे  मानसिक नियंत्रण एवं आध्यात्मिक विकास के लिए हमें भगवान शिव के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित करती है और फिर हम सभी भक्त भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा अर्चना में लग जाते हैं चूंकि प्रकृति स्वयं शिवा अर्थात पार्वती है जो शिव का ही भाग है इसलिए प्रकृति के साथ पूरा वातावरण ही शिवमय हो जाता है और हमारा मन भी शिव में लीन होने लगता है।   हिंदू धर्म में माना जाता है कि भगवान शिव को समर्पित इस विशेष काल में शिव नाम से ही मा...

उत्तराखंडी अनाज.....झंगोरा (Jhangora: Indian Barnyard Millet)

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उत्तराखंडी अनाज.....झंगोरा   गहत (कुलथ) का फाणू, भटवाणी, बाड़ी, झोली, कढ़ी, डुबका, आलू के गुटके, कद्दू का रैठू, काखड़ी का रैला, चैंसू, कंडाली का साग, पिंडालू के पत्तों की काफली, आलू का झोल, आलू/ मूली की थिंच्वाणी, तिल/भंगलू की चटनी,कचमोली, कद्दू की सब्जी, झंगोरे की खीर, अरसा, सिंगौड़ी . ... नाम तो सुने ही होंगें आपने। हाँ, ये नाम उनके लिए नये हो सकते हैं जो उत्तराखंड से नहीं है। बता दे कि ये सारे नाम है उत्तराखंडी व्यंजनों के। इनके तीखे, खट्टे और मीठे स्वाद का तो हर पहाड़ी दीवाना है। अगर आप उत्तराखंड से हैं और अगर इनमें से एक पकवान भी आपके जिव्हा तक नहीं पहुँचा है तो मैं तो ये समझूँगी कि आप उत्तराखंड में सिर्फ रह रहे हैं आप उत्तराखंडी नहीं हैं।     वैसे तो हर राज्य की अपनी एक अलग पहचान होती है, वहाँ का रहन सहन, वहाँ की वेशभूषा, वहाँ का खान पान का अपना अलग महत्व होता है। ऐसे ही उत्तराखंड के लोगों का खान पान भी बहुत साधारण किंतु स्वास्थ्यवर्धक होता है। उत्तराखंड में गेंहू, धान, मंडुआ, झंगोरा, दाल, कौणी, चीणा नामक अनाज की खेती होती रही है, लेकिन आज का ये ले...

चेतावनी...(प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदा)

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         पहाड़ यूं ही नहीं बनें है, इनकों बनने में समय लगता है। ये एक ऐसी भूवैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें वर्षों लग जाते हैं। पृथ्वी के अंदर तो हलचल होती ही रहती है, कभी ज्वालामुखी से तो कभी पृथ्वी की प्लेटों के आपस के टकराव से ही पहाड़ बनते हैं। ये सभी कारक मिलकर पहाड़ को कई फीट ऊँचा तो बना देते हैं लेकिन मौसम और आसपास की जलवायु के कारणों से इनकी ऊँचाईयां घटती भी है।    हम तो अपनी आम जिंदगी में यही मानते हैं कि जो शक्तिशाली हो, कठिन हो, स्थिर हो, विशाल और भारी हो पहाड़ है। तभी तो हम अपनी दिनचर्या में भी कितनी बार पहाड़ की संज्ञा दे देते हैं, जैसे, पहाड़ टूटना, पहाड़ उठाना, पहाड़ से टक्कर लेना, पहाड़ खोदना इत्यादि। अब जब हमें ये पता है कि पहाड़ अपने आप में कितना जटिल और कठिन है तब हमें यह भी मानना होगा कि इन पहाड़ों पर रहने वाले लोगों का जीवन कितना कठिन होता होगा। पहले तो चुनौती सिर्फ जीवनयापन के लिए होती थी लेकिन आज के समय में ये लोग तो जीवनरक्षा का जोखिम भी उठाय हुए हैं। यहाँ के लोगों के लिए जीवन सच में पहाड़ जैसा कठिन ही है। कभी भूस्ख...

मायका मतलब सेवा, सुख, स्मृति और सीख ।।

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मायका मतलब सेवा, सुख, स्मृति और सीख    पिछले लेख में मैंनें कहा था कि कुछ दिनों के लिए मैं भी मायके का सुख लेने जा रही हूँ। इसीलिए लेख लिखने का समय कम ही मिलेगा। अब जब मैं अपने घर वापस आ गई हूँ तो सोचा कुछ अपने माँ पिताजी के लिए भी लिखूँ।      कहते हैं कि गरीबी से बड़ी कोई बीमारी नहीं होती, लेकिन जब अपनी माँ को देखती हूँ तो तब लगता है कि बीमारी से बड़ी कोई गरीबी नहीं और इससे बड़ा कोई और दोष भी नहीं। गरीब सिर्फ पैसों से गरीब हो सकता है लेकिन बीमारी वाला तो स्वास्थ्य से, समय से, इच्छाओं से, प्रयास से, उम्मीदों से हर तरह से गरीब होता है। गरीब चाहे कितना भी गरीब क्यों न हो, फिर भी वो एक समय की रोटी के लिए सोचता भी है और प्रयास भी करता है लेकिन वहीं दूसरी ओर बीमारी एक ऐसी जड़ है जो इंसान का जीवन रस सुखाती रहती है और दीमक की तरह उसका शरीर को धीरे धीरे खाती भी रहती है।     पापा अमूमन कहते हैं कि गरीबी को बड़े ही पास से देखा है और डर लगता है कि कभी वो पहले जैसे दिन न आयें। लगता है कि शायद, वे अपने बचपन और किशोरावस्था के दिन को याद करते होंगें,...