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देहरादून: बदलता मौसम...

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देहरादून: बदलता मौसम...    चलो अब तो बारिश हुई और अब जाकर कुछ ठंडक मिली है नहीं तो गर्मी से सब सूख रहे थे। वैसे गर्मियों के दिन है तो गर्मी पड़ेगी ही लेकिन इतनी गर्मी पड़ेगी इसका अंदाज़ा नहीं था। हालांकि हर वर्ष यही कहा जाता है कि पिछले वर्ष की तुलना में इस साल बहुत गर्मी है लेकिन सच में देहरादून में ऐसी गर्मी का अनुभव पहली बार ही हुआ क्योंकि भले ही देहरादून में तीन चार दिन जलनखोर गर्मी हो लेकिन उसके अगले दिन ठंडक देने बरखा रानी आ ही जाती थी। मगर जाने क्या हुआ इस बार कि बारिश को आते आते 15-20 दिन लग गए लेकिन देर से ही सही अब राहत मिली है क्योंकि बारिश के बाद गर्म मौसम यहाँ उमस नहीं अपितु ठंडा कर देता है।    यहाँ के मौसम का मिजाज ऐसा है कि बस एक बारिश की फुहार और फिर तपने वाला देहरादून ठंडक वाली दून घाटी में बदल जाता है। इसलिए कहा जाता है कि देहरादून के मौसम का कुछ पता नहीं चलता, कब पलट जाए। तभी तो कब से उम्मीद लगा के बैठे थे कि देहरादून का पारा तीन- चार दिन बढ़ते बढ़ते अब तो पलटी मार के नीचे लुढ़क ही जायेगा लेकिन इस बार हमारा ये ख्याल हवा हो गया। देहरादून जो हमेशा से अपने ख

मिशलिन स्टार शेफ विकास खन्ना: सीखने के लिए जुनून जरूरी है...

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मिशलिन स्टार शेफ विकास खन्ना: सीखने के लिए जुनून जरूरी है...     शेफ विकास खन्ना को आज कौन नहीं जानता। ये वो हस्ती है जिनका नाम केवल होटल या रेस्टोरेंट में ही नहीं अपितु पूरी दुनिया में इज्जत के साथ लिया जाता है। 'शेफ विकास खन्ना' जिन्होंने भारतीय व्यंजनों का स्वाद पूरी दुनिया को नए स्वरूप में चखाया।    आज अपनी इसी पर पाक कला के दम पर शेफ विकास खन्ना दुनिया के 10 बेहतरीन ग्लोबल शेफ में से एक हैं। पहली जून को गजेट रिव्यू में शेफ विकास खन्ना को छठा स्थान मिला है और शेफ गॉर्डन रामसे को पहला। शेफ विकास खन्ना को इन्ही सुप्रसिद्ध शेफ गॉर्डन रामसे के शो में भी काम किया है।  पूरी दुनिया के शीर्ष दस में से छठा बेस्ट शेफ होना बहुत बड़ी बात है और भारतीय स्वाद और उसके कारोबार से जुड़े हर भारतीय के लिए ये एक गर्व की बात है।     अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अमृतसर मूल के शेफ विकास खन्ना मिशलिन स्टार भी है जो उन्हें उनके न्यूयाॅर्क स्थित जुनून रेस्त्रां के लिए दिया गया है। मिशलिन स्टार अवार्ड एक फ्रांसीसी अवार्ड है जो फाइन डाइनिंग रेस्टोरेंट की दुनिया में बेहतरीन काम करने वालों को

Chef: Heart/King of the kitchen

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Chef: King of the kitchen    शेफ का मतलब कैंब्रिज डिक्शनरी में भले ही स्किल्ड और ट्रेन्ड कुक हो जो होटल या रेस्टोरेंट में काम करता है लेकिन एक आम भाषा में एक शेफ पूरी किचन का कर्ता धर्ता होता है जिसका काम केवल चूल्हे में खाना बनाना नहीं बल्कि हर एक मसाले की पहचान, जायकों की समझ, खाना पकाने की तकनीक का ज्ञान, मेनू प्लानिंग, नई नई विधियों से लेकर पारंपरिक पकवान को सर्वोत्तम बनाने तक का होता है। साथ ही होटल रेस्टोरेंट के किचन की बजट/कोस्टिंग से लेकर पूरे किचन ऑपरेशन की जिम्मेदारी भी बेहतरीन तरीके से निभाता है असल में वही शेफ है। इन्हीं सब के चलते अगर शेफ को किचन का राजा कहा जाए तो कुछ गलत नहीं है। अब अगर राजा निपुण होगा तो राज्य बढ़ेगा उसी तरह जब एक शेफ मास्टर होगा तो बिजनेस बढ़ेगा क्योंकि पूरे किचन की बागडोर मास्टर शेफ के हाथों में जो होती है।     सफेद शेफ कोट और अप्रैन पहने जो सिर पर बड़ी सी सफेद टोपी केवल शेफ कैप नहीं उसके लिए किचन का ताज होता है। भले ही शेफ कैप हाइजीन के मानकों को पूर्ण करती हो लेकिन शेफ के लिए उसकी वर्दी और उसकी शेफ कैप उसका मान होता है जो उस

गर्मी में प्रभु का धन्यवाद!!

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गर्मी में प्रभु का धन्यवाद!!    हम लोग न शिकायत बहुत करते हैं। कभी अपनो से तो कभी अपने आप से और जब कभी कुछ नहीं सूझता तो भगवान से ही शिकायत कर लेते हैं क्योंकि यहां तसल्ली मिलती है कि कोई सुने या न सुने लेकिन मेरा भगवान तो जरूर सुनेगा। अब इसे हम शिकायत समझे या फिर अपनी इच्छाएं ये तो भगवान ही जाने हम तो बस भगवान के तथास्तु की इच्छा रखते हैं लेकिन अपनी इच्छाओं के साथ आगे बढ़ते बढ़ते उस ईश्वर का धन्यवाद देना भी भूल जाते हैं जिसने हमेशा सहारा दिया है।       वैसे तो ईश्वर के आगे हम सभी नमन करते हैं लेकिन कभी कभी उसकी कृपा देर से समझ आती है। अभी पिछले शनिवार की ही बात है जब मुझे भी इस बात का अनुभव हुआ कि चाहे जो भी दिया है जितना भी दिया है उसके लिए ईश्वर का धन्यवाद है।    पिछले हफ्ते ही ऋषिकेश जाना हुआ लेकिन बिना अपनी गाड़ी के। काफी समय गुजर गया है किसी भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सेवाएं लेते हुए । कहीं भी जाना हो चाहे पास का सफर हो या दूर का अब अधिकतर अपना वहां ही प्रयोग होता है। भीड़भाड़ वाली जगह हो तो दुपहिया नहीं तो अपनी गाड़ी से ही चल पड़ते हैं। और जब न अपनी दुपहिया हो और न ही

Hotel & Hospitality: एक विशाल परिवार!!

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Hotel & Hospitality: एक विशाल परिवार!!    मेरे फोन में केवल 30% नंबर ही मेरे अपने घर परिवार और दोस्त के हैं। बाकी बचे लगभग 70% नंबर तो होटल और हॉस्पिटैलिटी से जुड़े लोगों के है। इसे देखकर लगता है कि अपने परिवार से बड़ा तो ये होटल और हॉस्पिटैलिटी का परिवार है जहां नित नए लोग मुझसे जुड़ते चले जा रहे हैं और ऐसा ही हाल उन सभी लोगों का भी है जो इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं।    सच कहती हूं 11 साल पहले जो होटल और हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र से क्या जुड़ी, मुझे लग रहा है कि आज तक नए लोगों से जुड़ रही हूं। सीमित परिवार के साथ सीमित मोबाइल नो. लेकिन इस विशाल क्षेत्र से जुड़ने का मतलब मेरे व्यवसायिक परिवार का अपने आप विशाल हो जाना है।     होटल और रेस्टोरेंट उद्योग अपने आप में इतना विशाल है कि रोज कितने ही नए लोग इससे जुड़ते चले जा रहे हैं और एक परिवार की तरह आपस में बंधे जाते हैं क्योंकि जैसे हमारी दुनियां गोल है वैसे ही होटल और रेस्टोरेंट की दुनिया भी गोल है जहां सभी लोग अपना अपना काम करते हुए आपस में जुड़ते चले जाते हैं और किसी न किसी छोर पर आपस में मिल भी जाते हैं।     भले

उत्तराखंड पर्यटन: चारधाम यात्री कृपया ध्यान दें...

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उत्तराखंड पर्यटन: चारधाम यात्री कृपया ध्यान दें...    गर्मियों में धूप के कारण घर से बाहर निकलने का बिलकुल भी मन नहीं होता लेकिन जब बात उत्तराखंड जाने की हो तो सोचना क्या क्योंकि यहां की मौसम, पेड़ पौधे, पहाड़, नदियां आपको उत्तराखंड की ओर आकर्षित करती हैं इसीलिए तो उत्तराखंड में पर्यटकों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है लेकिन सच बात तो यह है कि यह उत्तराखंड देवभूमि है जहां प्रकृति के साथ देव दर्शन भी होते हैं इसीलिए देश विदेश से लोग उत्तराखंड घूमने आ रहे हैं।    उत्तराखंड में यात्रा तो आप कभी भी कर सकते हैं लेकिन हिमालय के चार धाम यात्रा का समय निश्चित होता है। उत्तराखंड में चार धाम यात्रा, गंगोत्री, यमनोत्री, बद्रीनाथ, केदारनाथ की यात्रा एक निश्चित अंतराल के लिए ही खुलती है इसलिए चार धाम यात्रा के लिए आप उत्तराखंड में कभी भी नहीं अपितु विशेष समय पर ही जा सकते हैं। जब इन धाम के कपाट खुलेंगे तभी उत्तराखंड के इन पावन धामों की यात्रा की जा सकती है।    अक्षय तृतीया 3 मई से ही गंगोत्री और यमुनोत्री यात्रा आरंभ हो रही है। केदारनाथ जी के द्वार 6 मई और बद्रीनाथ जी के कपा

जंगल: बचा लो...मैं जल रहा हूं!

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जंगल: बचा लो...मैं जल रहा हूं!    इन दिनों हर कोई गर्मी से बेहाल है क्या लोग और क्या जानवर। यहां तक कि पक्षियों के लिए भी ये दिन कठिन हो रहे हैं। मैदानी क्षेत्र के लोगों को तो गर्मी और उमस के साथ लड़ाई लड़ने की आदत हो गई है लेकिन पहाड़ी क्षेत्र के जीव का क्या उन्हें गर्मी की आदत नहीं है क्योंकि गर्मियों में सूरज चाहे जितना भी तपा ले लेकिन शाम होते होते पहाड़ तो ठंडे हो ही जाते हैं। लेकिन तब क्या हाल हो जब पहाड़ ही जल रहा हो?? उस पहाड़ के जंगल जल रहे हो, वहां के औषधीय वनस्पति से लेकर जानवर तक जल रहे हों। पूरा का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र संकट में हो!! उस पहाड़ी क्षेत्र का क्या जहां वन ही जीवन है और जब उस वन में ही आग लगी हो तो जीवन कहां बचा रह जायेगा!!      पिछले कुछ दिनों से बस ऐसी ही खबरें सुनकर डर लग रहा है क्योंकि हमारा जंगल जल रहा है। पिछले साल इसी माह के केवल पांच दिनों में ही जंगल की आग की 361 घटनाएं हो चुकी थी और इसमें लगभग 570 हेक्टेयर जंगल की भूमि का नुकसान हो चुका था। और इस साल 2022 में भी 20 अप्रैल तक 799 आग की घटनाएं सामने आ चुकी हैं जिसमें 1133 हेक्टेयर वन प्रभ

स्कूल का खुलना...चैन की सांस..Reopening of Schools

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स्कूल का खुलना...चैन की सांस स्कूल का पहला दिन   रात में घड़ी घड़ी नींद से जागना फिर मोबाइल में समय देखना और फिर दोबारा सो जाना। बस यही क्रम पूरी रात भर चलता रहा और जब सुबह उठी तो अलग ही उलझन हो रही थी। कभी यहां कभी वहां करते हुए घर के बस चक्कर ही लग रहे थे काम तो निपट ही नहीं रहा था। सब कुछ आधा अधूरा था, जो काम कुछ मिनटों का था पता नहीं किस हड़बड़ाहट में घंटा भर लग रहा था। आज कुछ खास था।   आज जय का पहला दिन था उसके स्कूल जाने का शायद इसीलिए मैं कुछ बावली सी हो रखी थी और शायद यही हाल उन सभी मां का भी हो जो पहली बार अपने बच्चे को स्कूल भेज रही हो और उनका भी जो पूरे दो साल के बाद अपने बच्चों को स्कूल के हवाले कर रही हो क्योंकि जितने बच्चे अपने स्कूल जाने में उत्सुक थे उतने ही उत्सुक उनके अभिभावक भी थे। वैसे जिया के समय भी ऐसा ही उत्साह था बस शंकाएं नहीं थी लेकिन जय के साथ उत्साह और शंका दोनों थी क्योंकि कभी उसको अकेला नहीं छोड़ा। अगर जय थोड़ी देर भी शांत रहता है तो लगता है कि ये जरूर कुछ उटपटांग ही कर रहा होगा। और ऐसा ही अन्य मां भी सोच रही होंगी जिनके बच्चे अधिक नटखट होंगे