सावन विशेष: शिव के प्रिय..

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सावन विशेष: भगवान  शिव के प्रिय कौन हैं?  जानिए   सावन आये और शिव का नाम न हो!! ऐसा कैसा हो सकता है। जैसे सावन की बारिश से धरती का वातावरण साफ और शुद्ध हो जाता है वैसे ही सावन में शिव के नाम से ही मन भी निर्मल होने लगता है। सावन माह की बारिश में हर वनस्पति अपने वृद्धिकाल में होती है इसलिए धरती का कोना कोना हरियाली से भरा रहता है और जब प्रकृति अपने इस सुंदर रूप में होगी तो मन का चंचल होना स्वाभाविक है। ऐसे में जहां मन अस्थिर होता है वहीं सावन में मन को स्थिर और शांत रखने के लिए शिव का ध्यान किया जाता है। ऐसे में प्रकृति स्वयं हमारे  मानसिक नियंत्रण एवं आध्यात्मिक विकास के लिए हमें भगवान शिव के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित करती है और फिर हम सभी भक्त भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा अर्चना में लग जाते हैं चूंकि प्रकृति स्वयं शिवा अर्थात पार्वती है जो शिव का ही भाग है इसलिए प्रकृति के साथ पूरा वातावरण ही शिवमय हो जाता है और हमारा मन भी शिव में लीन होने लगता है।   हिंदू धर्म में माना जाता है कि भगवान शिव को समर्पित इस विशेष काल में शिव नाम से ही मा...

गांधीवादी से गांधीगिरी तक!!

गांधीवादी से गांधीगिरी तक!!
  गांधी जी के बारे में इतना लिख और पढ़ चुके हैं लोग कि अब और कुछ बचा नहीं है बताने को तभी तो आज अगर पूछा जाए कि ऐसा कौन है जो गांधी को सुनना, देखना या पढ़ना पसंद करता हो तो जवाब में बहुत कम ही लोग हामी भरेंगे। उनके विषय में आज शायद सबके अपने अपने विचार और तर्क होंगे लेकिन राष्ट्रपिता तो वही हैं।
   अब भले ही लोग गांधी से प्रेम करें या न करें लेकिन गांधी जयंती से प्रेम तो करते ही हैं क्योंकि इस दिन अवकाश का आनंद जो मिलता है और अवकाश का आनंद तो दोगुना तब हो जाता है जब अगले दिन भी शनिवार या रविवार हो। 
  इस बार भी ऐसा ही योग बना है कि अब छुट्टी का मजा दो दिन तक रहेगा लेकिन क्या हम भी गांधी जयंती में गांधी जी को याद करेंगे?? ये भी सोचना पड़ेगा न!!

    आज समय के साथ भले ही बहुतों के मन से गांधीवादी विचार धुल रहे हों लेकिन उनकी अहिंसक छवि मिटी नहीं है और आज भी जब बच्चा उनके चित्र के सामने खड़े होकर पूछता है कि ये कौन है?? तो हमारे मुंह से एक सुर में निकलता है 'राष्ट्रपिता महात्मा गांधी'। इसलिए ये तो मानना ही पड़ेगा कि हमारे अंदर किसी कोने में गांधी नाम न भी हो लेकिन गांधीवाद तो है ही। 
   और इसी गांधीवाद के लिए दो अक्टूबर के दिन उनके चरित्र के लिए, विचार के लिए, सत्य के लिए, समर्पण के लिए, सेवा के लिए, त्याग के लिए, सादा जीवन के लिए घंटो नहीं लेकिन कुछ मिनट के लिए महात्मा गांधी जी को याद करना चाहिए। 
   भले ही उनकी कोई किताब (सत्य के साथ मेरे प्रयोग, मेरे सपनों का भारत, हिन्द स्वराज)पढ़ी जाए, या फिर उनका प्रिय भजन (वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीर पराई जाणे रे )सुना जाए या गुनगुनाया जाए, या फिर गांधी आश्रम की कोई वस्तु ली जाए या खादी पहनी जाए और कुछ नहीं तो लगे रहो मुन्नाभाई या मुन्नाभाई एमबीबीएस ही देखी जाए जहां मुन्ना भाई भी गांधीवादी को अपनाकर गांधीगिरी तक पहुंच गया था और अपनी हर मुश्किल का हल उसनेे निकाल ही लिया था। इसलिए इस गांधी जयंती के अवकाश में भले ही कुछ समय लेकिन गांधीदर्शन के लिए या तो गांधीवाद नहीं तो गांधीगिरी अपनाई जाए।


एक - Naari

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