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सावन विशेष: शिव के प्रिय..

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सावन विशेष: भगवान  शिव के प्रिय कौन हैं?  जानिए   सावन आये और शिव का नाम न हो!! ऐसा कैसा हो सकता है। जैसे सावन की बारिश से धरती का वातावरण साफ और शुद्ध हो जाता है वैसे ही सावन में शिव के नाम से ही मन भी निर्मल होने लगता है। सावन माह की बारिश में हर वनस्पति अपने वृद्धिकाल में होती है इसलिए धरती का कोना कोना हरियाली से भरा रहता है और जब प्रकृति अपने इस सुंदर रूप में होगी तो मन का चंचल होना स्वाभाविक है। ऐसे में जहां मन अस्थिर होता है वहीं सावन में मन को स्थिर और शांत रखने के लिए शिव का ध्यान किया जाता है। ऐसे में प्रकृति स्वयं हमारे  मानसिक नियंत्रण एवं आध्यात्मिक विकास के लिए हमें भगवान शिव के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित करती है और फिर हम सभी भक्त भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा अर्चना में लग जाते हैं चूंकि प्रकृति स्वयं शिवा अर्थात पार्वती है जो शिव का ही भाग है इसलिए प्रकृति के साथ पूरा वातावरण ही शिवमय हो जाता है और हमारा मन भी शिव में लीन होने लगता है।   हिंदू धर्म में माना जाता है कि भगवान शिव को समर्पित इस विशेष काल में शिव नाम से ही मा...

टैटू बनाना सही या गलत!!

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टैटू बनाना सही या गलत!! (Tattoo is right or wrong)     "आखिर जरूरत क्या है...ईश्वर की दी हुई देह में छेड़ छाड़ की अच्छा खासा तो शरीर है त्वचा है फिर ये एक पतली सुई से शरीर को गुदवाना और नीली लाल स्याही से चित्रकारी करना उचित है क्या?? ऐसी क्या आफत आई कि टैटू के कारण दर्द को सहा जाए!! "   ये सब तभी लिखा जब जीवन का एक अनुभव अपने शरीर को गुदवाते जिसे आज के समय में टैटू कहते के रूप में ले रही थी। मुझे लग रहा था कि कहीं मैंने गलत निर्णय तो नहीं ले लिया!! बस इतना ही सोचा और लिखा क्योंकि शरीर में सुइयों की चुभन का दर्द तो था ही और साथ में मशीन की गर्र-गर्र की आवाज ने दिमाग को शून्य कर दिया था। उसके बाद तो बस यही सोचा कि अब जब ओखल में सिर रख दिया तो मूसल से क्या डरना..!!'   और अब जब टैटू आर्टिस्ट (प्रकाश शाही) ने अपना काम आरंभ कर दिया था तो अब बचा नहीं जा सकता क्योंकि गुदवाने का कार्यक्रम अब चल चुका था।    छोटे भाई के टैटू देखकर इच्छा तो बहुत समय से थी कि एक बार इसका भी अनुभव लिया जाए क्योंकि उसके हाथ, गर्दन और कंधे में भी टैटू हैं.. .इ...

100th Special: Thank You

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100th Special: Thank You & Happy Diwali         आज का लेख मेरे लिए बहुत खास है क्योंकि ये 100वां लेख है और वो भी सबसे खास त्यौहार दिवाली के साथ। भले ही ये आंकडा बहुत बड़ा न हो लेकिन 'शतक' की तो अपनी पहचान है। कितने लोग मेरा लेख पढ़ते हैं या नहीं भी पढ़ते, कितने लोग मुझे जानते हैं और कितने नहीं भी जानते लेकिन उन सभी की शुभकामनाओं के लिए बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद।    पिछले लगभग दो ढाई सालों से अच्छा बुरा जो भी मन किया बस वो लिख दिया। न कोई विषय विशेष न कोई व्यक्ति विशेष, बस जैसा लगा वैसा लिख दिया लेकिन एक चीज थी जो बड़ी ही सामान्य थी वो थी संतुष्टि। हर एक पोस्ट के बाद एक तसल्ली मिलती थी, एक खुशी होती थी कि मैंने अपने लिए समय निकालकर कुछ तो लिखा है. भले ही इसके लिए हफ्ते दो हफ्ते का समय लगा हो!   लिखने का सफर भी कोरोना काल से ही आरंभ हुआ है जो बहुत लंबा तो नहीं है लेकिन न भूलने वाला है। यह समय सभी के लिए बहुत कठिन और कष्टदायी था लेकिन इस कठिन समय ने बहुत कुछ सिखाया भी।    कोरोना के समय लॉक डाउन में जहाँ सभी परेशान थे वहीं सुकून ...

बालमन का दशहरा

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   बालमन का दशहरा     बाल मन पढ़ना बहुत ही कठिन है या यूँ कहो कि उसको समझना अपने बस की बात नहीं है। सुबह से लेकर रात तक तरह तरह के रूप देखने को मिलते हैं। गुस्सा, जिद्द, लाड, प्यार, लड़ाई, बचपना, सयानापन, मस्ती, नादानी और न जाने क्या क्या रूप घड़ी घड़ी देखने को मिलते हैं और इन सभी रूपों से निपटने के लिए मेरा तो धैर्य कितनी बार टूट जाता है लेकिन अगले ही पल दिल को तसल्ली देती हूँ कि ये सब केवल कुछ साल तक ही है। उसके बाद तो बचपन हवा हो जायेगा और फिर बस जिंदगी किसी न किसी रेस में भागती दौड़ती मिलेगी और तब बचपन के यही दिन और रूप याद आयेंगे।      नटखट कम शैतान जय ऐसा ही है जो दिन भर नाक में दम करके रखता है। घड़ी घड़ी उसकी मनमानी चलती रहती है, जिद्द चलती रहती है इसलिए उसे डाँट भी मिलती है और मार भी लेकिन कभी कभी उसके बाल मन की कल्पनाओं से आश्चर्य भी होता है और लाड भी। जैसे आजकल वो राम लीला की कल्पनाओं में उड़ान भर रहा है। अब घर में तो आजकल न रामायण देखी जा रही है और न ही पढ़ी जा रही है लेकिन जय स्कूल से सीख कर जरूर आया है क्योंकि वो स्कूल से राव...