सावन विशेष: शिव के प्रिय..

चित्र
सावन विशेष: भगवान  शिव के प्रिय कौन हैं?  जानिए   सावन आये और शिव का नाम न हो!! ऐसा कैसा हो सकता है। जैसे सावन की बारिश से धरती का वातावरण साफ और शुद्ध हो जाता है वैसे ही सावन में शिव के नाम से ही मन भी निर्मल होने लगता है। सावन माह की बारिश में हर वनस्पति अपने वृद्धिकाल में होती है इसलिए धरती का कोना कोना हरियाली से भरा रहता है और जब प्रकृति अपने इस सुंदर रूप में होगी तो मन का चंचल होना स्वाभाविक है। ऐसे में जहां मन अस्थिर होता है वहीं सावन में मन को स्थिर और शांत रखने के लिए शिव का ध्यान किया जाता है। ऐसे में प्रकृति स्वयं हमारे  मानसिक नियंत्रण एवं आध्यात्मिक विकास के लिए हमें भगवान शिव के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित करती है और फिर हम सभी भक्त भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा अर्चना में लग जाते हैं चूंकि प्रकृति स्वयं शिवा अर्थात पार्वती है जो शिव का ही भाग है इसलिए प्रकृति के साथ पूरा वातावरण ही शिवमय हो जाता है और हमारा मन भी शिव में लीन होने लगता है।   हिंदू धर्म में माना जाता है कि भगवान शिव को समर्पित इस विशेष काल में शिव नाम से ही मा...

सर्दी...शादी...स्वेटर..

   सर्दी...शादी...स्वेटर.. 
   शादियों का मौसम है और वो भी सर्दियों में। दुल्हा, दुल्हन बरात, मेहंदी, हल्दी, फेरे, विदाई, दावत, ढेर सारी जगमगाती रोशनी और उन रोशनियों में चमकते चेहरे। 
  अब दुल्हा दुल्हन के चेहरे की चमक का तो कोई जवाब ही नहीं है। ये उनकी खुशियों की प्राकृतिक चमक है जो उनके चेहरों से अधिक उनकी आँखों में होती है। साथ ही परिवारजन और शुभचिंतकों की खुशियों में भी कोई कमी नहीं होती खासकर कि महिलाओं और युवतियों की जिनकी खुशियों में इतनी गर्माहट होती है कि चाहे कितनी भी ठंड हो बिना स्वेटर या किसी भी गर्म कपड़ों के हर शादी चल जाती है।

    जहाँ आदमी और लड़के लोग सूट, स्वेटर, जैकेट, शाल पहने उनके इस साहस को देखकर हैरान होते हैं तो वहीं वृद्ध माताएं तरह तरह के ज्ञान देकर उन्हें घुडाकानें से भी नहीं चूकती। लेकिन क्या करें शादी की चकाचौंध की जो गर्माहट होती है वो बहुत ही नर्म और मखमली होती है  जिसके बीच सच में ठंडक गायब हो जाती है जिसे केवल महिलाएं ही समझ सकती है। और अगर आप उन्हें समझना चाहते हैं तो उसके लिए आपके पास भी उतना उत्साह होना चाहिए जितना कि एक शादी में जाने के लिए लहंगे, साड़ी, आभूषण, मेकअप और बालों को सजाते समय महिलाओं के पास होता है। 

   शादी की रस्मों और उनकी खुशियों के बीच भारी भरकम लहंगे, साड़ी, मैक अप का उत्साह किसी भी ठंड को काट देता है। इसीलिए अमूमन सामान्य ठंडियों के दिनों में स्वेटर, शाल, टोपी, मोजे पहनने वाली महिलाएं भी अपने उत्साह से शादी की रौनक में इन गर्म कपड़ों से परहेज कर लेती हैं और अपने पहनावे या साज सज्जा से किसी भी प्रकार का कोई समझौता नहीं करतीं। 
    वैसे ठंड या गर्म का आभास हमें दिमाग के द्वारा भेजे गए संकेतों से होता है। जब बाहर के वातावरण और शरीर के तापमान में अंतर आता है तब हमें ठंड या गर्मी का आभास होने लगता है जैसे कि अगर शरीर का तापमान बाहर के तापमान से अधिक होता है तो हमें ठंडा लगती है तब शरीर स्वयं अपनी ऊर्जा बनाकर शरीर का तापमान संतुलित करता है और ऐसे ही जब शरीर का तापमान बाहर के तापमान से अधिक होता है तो हमें गर्मी लगती है। अब ये तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण है लेकिन असल में शादी के ये दिन खुशियों के दिन होते हैं जो महिलाओं को ऊर्जा से भर देते हैं और उनकी यही ऊर्जा उन्हें ठंड से बचाने का काम करती है। उनकी ऊर्जा खाने पीने से लेकर सजने संवरने तक खूब फलती फूलती हैं। इन उत्सवों के प्रति उनका जोश और उत्साह उनकी ऊर्जा को और बढ़ा देता है इसीलिए ठंड में भी हम महिलाओं और युवतियों को बिना ऊनी कपड़ों के भी देख सकते हैं। 
    दूसरा कारण ये भी है कि विवाह या ऐसे उत्सवों में खूब लोग इकट्ठा होते हैं, सभी नाते रिश्तेदारों के साथ साथ शुभचिंतकों का भी आना होता है। सभी उत्साह की उष्मा लिए मिलते हैं इसलिए भी ज्यादा लोगों के बीच सर्दी से बचाव हो जाता है और फिर जब विवाह के इन उत्सवों  में खूब नाच गाना होता है तो शरीर की ऊर्जा अपने आप गर्माहट बनाए रखती है। तभी तो वरमाला के बाद जब धीरे धीरे लोग अपने गंतव्य को जाने लगते हैं और नाच गाना भी कम हो जाता है तो सुंदर चमकदार कपड़ों पर स्वेटर या शाल की ओढ़नी भी आ जाती है और साथ ही कठिन तप को पूर्ण करने की संतुष्टि भी। 
एक -Naari
    

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मेरे ब्रदर की दुल्हन (गढ़वाली विवाह के रीति रिवाज)

उत्तराखंडी अनाज.....झंगोरा (Jhangora: Indian Barnyard Millet)

ननिहाल का आनंद