उत्तराखंड में मकर संक्रांति और पकवान

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उत्तराखंड में मकर संक्रांति का खानपान      नए वर्ष के आरंभ होते ही पहला उत्सव हमें मकर संक्रांति में रूप में मिलता है। इस संक्रति में सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है इसलिए इसे मकर संक्रांति कहते हैं। इसको उत्तरायणी भी कहा जाता है क्योंकि सूर्य दक्षिण दिशा से उत्तर की दिशा की ओर आता है। इसलिए आज से दिन लंबे और रात छोटी होने लगती है।  मकर संक्रांति का महत्व:   मकर संक्रांति का महत्व हिंदू शास्त्र में इसलिए भी है क्योंकि सूर्य देव अपने पुत्र जो मकर राशि के स्वामी हैं शनि से मिलते हैं जो ज्योतिषी विद्या में महत्वपूर्ण योग होता है। इसलिए माना जाता है कि इस योग में स्नान, ध्यान और दान से पुण्य मिलता है। वैसे इस दिन भगवान विष्णु की भी पूजा की जाती है क्योंकि कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने इस दिन मधु कैटभ दानवों का अंत किया था।    मकर संक्रांति से ही शुभ कार्यों का आरंभ भी हो जाता है क्योंकि उत्तरायण में हम 'देवों के दिन' और दक्षिणायन में हम रात मानते हैं इसलिए मांगलिक कार्यों का आरंभ आज से हो जाता है।    यहां तक कि माना जाता है कि उत्तरायण में मृत्यु से श्री चरणों में म

मेरे ब्रदर की दुल्हन (गढ़वाली विवाह के रीति रिवाज)

मेरे ब्रदर की दुल्हन (गढ़वाली विवाह के रीति रिवाज)

   कल यानी 21 नवंबर को मैं आई और आज बड़ी दीदी क्योंकि माइके में भाई की शादी है और घर में रौनक तो बेटियों से ही होती है। इसलिए कुछ दिन पहले आना तो बनता ही है। इसबार जिया को घर ही छोड़ना पड़ा क्योंकि जैसे यहां की रौनक बेटियां हैं वैसे ही वहां की रौनक जिया है। दादा दादी की लाडली और अपने पापा की प्यारी है जिया इसलिए मेरे घरवाले अपने से दूर भेजते हुए हमेशा कंजूसी करते हैं।
  28 की शादी है लेकिन घर में मांगलिक कार्य का आरंभ 26 से शुरू है। कपड़े लत्ते, मिठाई पिठाई, पूजा पाठ सब काम का शुभारंभ हम सब बड़े आनंद से मिलजुलकर कर रहे हैं। यहां ऋषिकेश सिर्फ मेरा मायका ही नहीं है अपितु मायके की पूरी बारात है। हमारे घर के साथ ही मेरे तीन भाई का परिवार भी है और मेरी तीनों बहनें भी ऋषिकेश में ही हैं इसलिए मेरे लिए मायके आना हमेशा से ही किसी उत्सव में भाग लेने जैसा रहता है और जब दो बहनें एक साथ एक जगह हो तो अन्य बहनों का मन कहां मानने वाला होता है इसलिए क्रमश: बड़ी दीदी के बाद छोटी दीदी और उसके बाद मेरी छोटी बहन भी अपने छोटे बच्चों के साथ पहुंच गई और अब घर में बातें कम और बच्चों का शोर ज्यादा था। 
   सोच रहीं हूं कि मां बाबू जी मन ही मन कह रहे होंगे की ये अपने ही घर में ठीक थे। यहां तो समय से सोना भी दूभर हो गया है क्योंकि पिता जी हमेशा से ही 10 बजे तक सो जाते हैं और ठीक 4 बजे उठते हैं। अब यहां तो बच्चों का इतना शोर शराबा हो गया है कि उनका पूरा दैनिक कार्यक्रम गड़बड़ा गया है!!
   फिर भी इन छूटंको के बीच भी बहुत से काम तो निपट ही रहे हैं जैसे शगुन के लिफाफे, कपड़ो की पैकिंग और हम महिलाओं का सबसे महत्वपूर्ण काम चेहरा चमकाओ अभियान। कीर्तन से लेकर फेरों तक के कपड़े उसके साथ के मैचिंग ज्वैलरी और साथ ही मैचिंग चूड़ी सब कुछ समान साथ है लेकिन फिर भी रोजाना बाजार तक एक चक्कर लगाना और कुछ न कुछ खरीदना एक आदत बन गई है। 'अरे! ये तो छूट गया', 'ओह हो! अभी तो यह भी लाना था' बस यही सोच कर घर के साथ ही बाजार में भी समय बीत रहा है और हर बार मां बस यही बोल रही हैं कि 'और कितना सामान इकट्ठा करना है तुमनें!' लेकिन मुझे लगता है शायद ऐसा होना हर शादी के घर में सामान्य सी बात है और वो भी हम तो यहां चार बहनें एक साथ हैं वो भी बच्चों समेत।
  दूल्हा (आशुतोष बडोनी) तो अलग ही अपनी दुनिया में है लेकिन हमारे पास उसके लिए तो छुटपुट कामों की लिस्ट हमेशा तैयार रहती है लेकिन काम के साथ ही उसके चेहरे की चमक कम न हो इसका भी बराबर ध्यान हम दे रहे हैं।
   वैसे तो हर शादी में नाच गाना, दावत, मस्ती धमाल समान्य सी बात है फिर भी प्रत्येक समाज में विवाह के अपने अलग रीति रिवाज होते हैं इसलिए उत्तराखंड की शादी का मतलब है ढ़ोल दमो, पूजन, मांगल, क्ल्यो और परंपरागत विवाह कार्यक्रम। 
  हमारे गढ़वाल में सबसे महत्वपूर्ण अतिथि मामा होते हैं और हमारे मामा जी अपने प्रिय भांजे की शादी में सबसे पहले मेहमान बने जो तीन दिन पहले पहुंच गए। वैसे हमारे मामा मामी मेहमान की भूमिका में नहीं अपितु परिवार का महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर आते हैं जो इतने वर्षों से हमेशा ही हमारे हर कार्य को सिद्ध करते आए हैं। 

कीर्तन/ महिला संगीत
    पहले तो केवल विवाह से एक रात पूर्व न्यूतेर का ही कार्यक्रम होता था जो आज भी बहुत महत्वपूर्ण होता है लेकिन अब कार्यक्रम का शुभारंभ दिन में ईश्वर से कीर्तन भजन के साथ ही होता है और हमारे घर तो विवाह के दो दिन पहले से ही महिला संगीत आरंभ हो चुका है। 
  कीर्तन मंडली की शानदार ढोलक की थाप और चिमटे की धुन में हर कोई रंगा हुआ था। कीर्तन मंडली भी अपनी ही थी। समझो की हमारी ही भाभियों, बहुओं और गली की दीदियों की टोली थी जिन पर खुशी की ऐसी तरंग छाई थी कि उन सभी के गलों के सुर ढोलक की थाप से भी ऊंचे निकल रहे थे। मुझे लगता है महिलाओं के लिए सबसे मनोरंजक साधन यही कीर्तन भजन है जहां वे बिना किसी रोकटोक के खुलकर नाच गाना करती है। इसलिए महिला संगीत और मेहंदी की रस्म आज अच्छे से निभ गई।
   26 नवंबर की खुशियां तो दुगुनी क्या तिगुनी हो चुकी थी क्योंकि आज भाई की शादी के संगीत के साथ साथ मेरे बड़े भाई भाभी की शादी की वर्षगांठ थी और बड़ी दीदी जीजा जी की शादी की 27वीं सालगिरह का दिन भी था।
 
न्यूतेर 
    न्यूतेर का अर्थ होता है वो मेहमान जिन्हें शादी का न्यौता दिया जाता है। इस रात में मेहमानों का स्वागत पिठाई (तिलक) और शगुन के साथ किया जाता है।
  अगले दिन 27 को न्यूतेर थे जो सनराइज वेडिंग फार्म ऋषिकेश में संपन्न होने थे। वैसे अब न्यूतेर स्थान पर कॉकटेल फंक्शन ही कहा जाता है। पहले न्यूतेर में आदमी लोग जलपान के साथ अपना इंतजाम किसी कोने में कर ही लेते थे लेकिन अब सबको पता है कि न्यूतेर में खाने के साथ पीना तो मुख्य रूप से होता है इसलिए अब पिठाई के स्थान पर लोग पीने की आचमन लेने पर अधिक प्रसन्न होते हैं इसलिए लोग अब न्यूतेर को कॉकटेल की संज्ञा देते हैं और 
हमारे लिए भी ये एक ऐसा दिन था जब हम लोगों ने खूब मस्ती की ओर जमकर डांस किया क्योंकि हमारे सारे मेहमान आज पहुंच गए थे। मामा, मौसा, मौसी, भाई भाभी, बहने, जीजा जी , भतीजे, सारे शुभचिंतक आज साथ में झूम रहे थे लेकिन होने वाला दूल्हा तो कॉकटेल की रंगत में अपने साथियों और शुभचिंतकों के बीच में ही पता नहीं कहां घूमता रहा। इतने लोगों के बीच में आखिर बाद में तो जहां केवल हम औरतों का कब्जा था वहां आदमी लोग भी आ ही गए और जमकर डांस किया। 
अब ये डांस वो स्वयं कर रहे थे या उनके अंदर की रसायनिक क्रिया हो रही थी पता नहीं लेकिन इतने लोगों में भी ईश्वर की कृपा से बिना किसी लड़ाई झगडे के लोगों ने बड़ा आनंद लिया। 
केवल नाच गाना ही नहीं अपितु लजीज खाने का भी लुत्फ लोगों ने जमकर लिया। एक और बात तो मैं बताना ही भूल गई कि मायके की ओर से विवाह के खाने का प्रबंध श्री कृष्णा केटरर की ओर से था जो मेरे बड़े जीजा पं प्रदीप शास्त्री (तीर्थ पुरोहित श्री बद्रीनाथ धाम) जी का था और इन्होंने ये जिम्मेदारी खूब अच्छे से संभाली।
   रात के दो बजे तक पतिदेव विकास ने अपने साढू भाइयों और आशु के दोस्तों संग न्यूतेर का भरपूर आनंद लिया हालांकि हम बहनें तो 12:30 बजे तक ही शामिल रही क्योंकि अगली सुबह बान (हल्दी की रस्म) भी थे। वैसे हमारे लिए तो आधी रात तक की मस्ती भी बहुत थी।

मंगल स्नान/ बान/ हल्दी हात
  जैसे अन्य क्षेत्र में हल्दी की रस्म बहुत खास होती है वैसे ही गढ़वाल में बान/हल्दी हात/ मंगल स्नान एक महत्वपूर्ण और अनौखी रस्म है। 
  गणेश पूजन के साथ सुहागवंती और कन्याओं द्वारा कच्ची हल्दी कच्यूर, सुमैया, मलेठी, जिरालू जड़ी बूटियों को औखल में कूटा जाता है और फिर सरसों तेल और दही मिलाकर पीतल की बड़ी परात में पांच दोनो में रखते हैं। इसी तैयार हल्दी से वर या वधु को हल्दी की रस्म की जाती है। 
   पीले दुशाले के बीच में थाली रखी जाती हैं जिसमें चावल, उड़द दाल की पकौड़ी, लड्डू और कुछ दक्षिणा होती है। इसे वर/ वधु के ऊपर पकड़ कर रखते हैं। पहले पंडित जी जो मेरा बड़ा भाई था, फिर पांच कन्याएं फिर सुहागवंती और फिर अन्य सभी रिश्तेदारों ने छोटी छोटी दूब घास (वंश वृद्धि सूचक) की गुच्छियो की सहायता से पहले पैर, घुटने, हाथ, कंधो और सिर पर इस हल्दी को लगाया जाता है वो भी माँगल (मंगल गीत) के साथ क्योंकि माँगल एक शुभ गान होता है इसलिए मेरी ताई और हमारे परिवार की सबसे बड़ी दीदी ने इस भूमिका को बहुत अच्छे से निभाया।
    ताई जी लंबे समय से शारीरिक कष्ट में थीं लेकिन भाई की शादी के लिए पहुंचीं और घर के बड़े होने का कर्तव्य पूरा किया और मंगल स्नान के बाद आरती की और उसके बाद लड्डू पकौड़ी का प्रसाद भी दिया। हल्दी हात में महिलाएं आपसी प्रेम और विनोद में एक दूसरे को भी हल्दी लगती हैं और इसी तरह परिवार के सभी लोगों ने भाई की हल्दी हात की रस्म भी पूरी हो गई।      
       बान के समय हर सुहागिन अपने पूरे श्रृंगार में रहती हैं और स्वर्णाभूषण भी पहनती हैं क्योंकि शुभ कार्य में सोने को शुद्ध धातु माना जाता है। आज के बान में लगा जैसे सभी महिलाएं 'बप्पी दा' के घर से आई हों। एक से बढ़कर एक अपने पारंपरिक गहनों के साथ चमकी हुई थीं। बान देने के साथ ही रंग बिरंगी चूड़ियां भी सभी को आकर्षित कर रही थीं इसलिए चूड़ियों का काउंटर भाभी, नानी, मौसी, दीदी सभी से भर गया। सच कहूं, चूड़ियां भले ही इन्होंने पहनी लेकिन उनका ढेर सारा प्यार और आशीर्वाद सिर्फ हमें ही मिला। 
 मंगल स्नान के साथ एक और रोचक रस्म भी होती है। मंगल स्नान के बाद पूजन और फिर वर का भिक्षक रूप भी दिखता है। धोती पहने, कंधे में झोला लटकाए और हाथ में टिमरू की लाठी पकड़े वर पंडित जी के लिए भिक्षा भी मांगता है। द्वार पर वर के माता और परिवारजन चावल और कुछ दक्षिणा भी झोले में डालते हैं।  

सेहरा भेंट
   बस मंगल स्नान के बाद थोड़ा सुस्ताने का मौका तक नहीं मिला और बारात में जाने की तैयारी होने लगी। दोपहर के खाने के बाद हम चारों बहनें पार्लर की ओर भागी क्योंकि भाई की शादी में हम सुंदर दिखने का एक भी मौका छोड़ना नहीं चाहते थे लेकिन यहां तो सेहराबंदी जिसे सेहरा भेंट भी कहते हैं उस की तैयारियां आरंभ होने लगीं क्योंकि पिताजी को बारात 4:30 बजे ऋषिकेश से देहरादून के लिए जो निकालनी थीं लेकिन बारात है तो समय लगेगा ही इसलिए 5:30 बजे से ही सेहराबंदी कार्यक्रम आरंभ हुआ। सेहराबंदी एक फारसी शब्द है हिंदी में अर्थ निकाला जाए तो दूल्हे को मुकुट बांधना ही होता है। सुनहरे लड़ियों यां फूलों से सजा सेहरा दूल्हे के सर पर सजाना होता है लेकिन भाई ने तो केवल अपनी पगड़ी को ही सेहरा समझ लिया क्योंकि उसे अपने को दूल्हे से अधिक शाही परिवेश में जो दिखना था।    बस तिलक, पगड़ी और साफा के साथ सेहराबंदी आरंभ हुई जो परिवार ही क्या सभी रिश्तेदार और शुभचिंतकों की नोटों की माला पहनाने तक चलती रही और भाई के चेहरे पर जो खुशी थी उसका तो कहना ही क्या! वो या तो दूल्हा बनने की खुशी थी या रुपयों के हार से थी पता नहीं लेकिन खुशी तो चेहरे पर साफ साफ दिखाई दे रही थी।

साह पट्टा
   यह रस्म पहले तो विवाह के कुछ दिन पूर्व कर ली जाती थी लेकिन अब समय के साथ और अपनी व्यस्तताओं के बीच बारात के दिन ही कर ली जाती है। 
  इस रस्म का अर्थ है वर पक्ष की ओर से बारात की विस्तृत जानकारी देना। इस रस्म में वर पक्ष के पंडित जी विवाह लग्न का मुहूर्त, फेरे, विदाई, दान, बारातियों की संख्या आदि का ब्यौरा वधु पक्ष को देता है। इस परंपरा में दही से भरी परोठी/ लौटे के मुंह पर पीला कपड़ा बांधकर उसमें मौली की सहायता से 5 या 7 उरद डाल की पकौड़ी बांधी जाती है इस परोठी के साथ पालक या हरा साग (हरियाली का सूचक) और मिठाई भी कन्या पक्ष को भेंट किया जाता है। कन्या पक्ष के लोग साह पट्टा के साथ आए मेहमानों का आदर सत्कार करते हैं और उनका सम्मान पिठाई (दक्षिणा) लगाकर करते हैं। कन्या पक्ष इस परोठी में चावल भरकर उसमें दक्षिणा के साथ वर पक्ष को वापस करते हैं। 

बारात अदरना/ धूलिअर्घ

 7 बजे के आस पास धीरे धीरे बारात का गाड़ी में बैठना भी आरंभ हो गया और लगभग 8:30 बजे देहरादून में बैंड बाजा बारात का एकत्रित होना भी। घुड़चड़ी की रस्म होते ही बस गाजे बाजे की धुन में बाराती भी अपने जलवे बैंड के साथ दिखाने लगे। दूल्हे के साथी ढोल की थाप में भांगड़ा करते नजर आए। कोई मुंह में नोट दबाए ढोल वाले को और तेज से ढोल बजाने के लिए उत्साहित करता तो कोई भाई नीचे बैठ कर नागिन डांस करता। 
    हम महिलाएं को कुछ अलग नहीं करना होता है, चाहे ढोलक हो, ढ़ोल हो, बैंड हो या डीजे हर जगह एक जैसा ही नृत्य करती हैं। बस गोल घेरा बनाओ और तोते उड़ाओ लेकिन सच कहूं, सबसे अधिक आनंद हम ही लेती हैं वो भी बिना किसी अंदर की रसायनिक क्रिया के! 
  किसी का पल्लू नीचे जमीन में पोछा मार रहा था तो किसी का गजरा गिर रहा था और किसी का काजल बह रहा था लेकिन हर कोई मस्त था क्योंकि किसी के चाचा की तो किसी के मामा की तो किसी के भाई या फिर किसी के देवर की और यहां तक की कुछ के तो आशु दादा की बारात थी। 
    बच्चे, वृद्ध भी बारात में अपना हुनर दिखा रहे थे और अब कुछ ही देर में खूब नाचते गाते हम बाराती भी द्वार पर पहुंच गए। धूलिअर्घ का समय था, मतलब की बारात का स्वागत के लिए कन्याएं सिर पर कलश और आम के पत्ते लिए स्वागत करेंगी। घोड़े से वर को वधु के चाचा और भाइयों ने धूलि अर्ध की पूजा के लिए जैसे ही उतारा वैसे ही दूल्हे के जूते यहां से गायब हो गए। जूता छुपाई की रस्म यहां से मोनिका (वधु) के भाई बहनों द्वारा आरंभ हो गई जो अब विदाई के समय तक चलेगी।

  कलश के पानी को पत्तों से बारातियों पर छिड़का जाता है और मंत्रोचार के साथ बारात का स्वागत किया जाता है। यहां हमारा स्वागत फूल मालाओं से तो हुआ ही लेकिन वधु पक्ष की ओर से दादी ने जोरदार स्वागत इस कलश के पानी को डालकर किया। थोड़ा गुस्सा तो जरूर आया लेकिन शादी में कोई विघ्न न हो इसलिए दादी का यह मजाक भी हजम करके हम आगे बढ़ गए। सोचती हूं कि दादी भी अपने समय में बहुत चकड़ैत (शरारती) रही होंगी। 

  द्वार रोकने की रस्म भी यहीं हुई जिसे हम गेट रोकना कहते हैं। इसे वधु की बहनों ने निभाया। द्वार पर लाल फीता बांधा हुआ था जिसे दूल्हे ने फीता काटकर बारात को आगे ले जाना था। इस रस्म में कई बार तो दूल्हे की होने वाली सालियों द्वारा खूब मोटी धनराशि मांगी जाती है लेकिन यहां केवल रस्म निभाई गई। सभ्य लोगों की यही पहचान भी होती है इसलिए हमनें भी शगुन का लिफाफा देकर अपनी बारात को अंदर प्रवेश करा दिया।
  इस समय भी वधु पक्ष की ओर से बारातियों की पिठाई बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है इसलिए वधु के पिताजी इतने बड़े फार्म में बारातियों को पिठाई के लिए ढूंढते दिखाई दिए। ये काम थोड़ा कठिन तो होता है लेकिन हमारी ओर से भाई ने उनकी यह समस्या थोड़ी हल करा दी।
   सभी नाते रिश्तेदार अपनी धुन में थे कोई खा रहा था कोई नाच रहा था कोई किसी से मिल रहा था लेकिन मैं कुछ बौराई सी थी क्योंकि बच्चे आज बिलकुल भी काबू में नहीं थे कभी उनके पीछे तो कभी उनके साथ भागना पड़ रहा था और साथ ही अपने शुभचिंतकों का आभार भी देना था इसलिए खाने पीने की तो छोड़ो बैठने तक की भी फुर्सत नहीं थी। शायद ऐसा ही हाल हम चारों बहनों के साथ था और पिता जी भी हम से अलग नहीं थे। चार बेटियों की शादी बहुत ही अच्छे से की और अब बेटे की बारी थी इसलिए उनका भी बैठना तो मुश्किल ही था। इतनी उम्र में भी पिता जी सभी बारातियों की व्यवस्था और खानपान के लिए सतर्क थे। 
   बस अब तो सभी जयमाला की प्रतीक्षा में थे और अब जैसे ही दुल्हन अपनी सखियों के साथ मंडप पर आई तो सबकी निगाहें केवल दुल्हन पर टिक गई। दुल्हन के चेहरे की मुस्कान भाई से बिल्कुल भी अलग नहीं थी। दोनों एक दूसरे को सम्पूर्ण कर रहे थे। जयमाला के साथ ही भाई के दोस्तों की ओर से शैंपेन की बोतलों के कॉर्क खुल गए और इसी के साथ सीटियों और तालियों से पूरा फार्म हाउस ही गूंज उठा। बस फिर क्या था, उसके बाद तो फोटोशूट का जो कार्यक्रम चला वो तो 'मेरी बारी कब आयेगी?' तक हर किसी के चेहरे पर दिखता रहा। 
  इसके बाद दूल्हा दुल्हन को खाने के लिए बुलाया गया लेकिन शायद समय अधिक होने के कारण टेबल पर ठंडा खाना ही परोसा गया। खाना भले ही स्वादिष्ट हो लेकिन सर्दियों में ठंडा खाना फीका ही लगता है। सोचती हूं कि इतने बड़े फार्म हाउस को चलाने वाले लोग इतने लापरवाह कैसे हो सकते हैं वो भी वे लोग जो पहले से इसी क्षेत्र के हों!! क्योंकि जो कहा गया था उसका केवल 60% तक ही पूरा कर पाए, बाकी 40% की जिम्मेदारी वो नहीं ले पाए या कहो वे भूल गए!!

बरडाली, गोत्राचार

 सुबह के ठीक चार बजे थे और अब समय था गढ़वाली विवाह का एक और आवश्यक चरण गोत्राचार का। वर पक्ष और वधु पक्ष दोनों बैठे थे। पंडित जी ने बर डाली का जैसे ही संकेत दिया मेरे सब भतीजे लोग तैयार हो गए समान लाने को और थोड़ी देर में हम सभी बर डाली सहित उपस्थित भी हो गए।
  वर पक्ष के लोग अपने साथ फल, मिठाई, सूखे मेवे, वस्त्र, गहने वधु को भेंट स्वरूप वधु पक्ष के सम्मुख देते हैं जिसे बर डाली कहा जाता है। गढ़वाल में कहा जाता था कि जिसकी बरडाली जितनी बड़ी वो परिवार उनता बड़ा होता है। कहने का अर्थ है कि यह बर डाली वर पक्ष की प्रतिष्ठा बताता है। 
 दोनों पुरोहित वर वधु की तीन पीढ़ियों का आपस में जानकारी लेते हुए मंत्रोचार करते हैं। पहले तो दोनों पुरोहित अपनी अपनी प्रतिभा अपने मंत्रोचार से करते थे लेकिन अब सब एक दूसरे की सहभागिता से काम चल जाता है। हम लोग ब्राह्मण परिवार से हैं इसलिए पूजा पाठ मंत्रोचार बहुत पहले से चला आ रहा है। मेरे ताऊजी स्वर्गीय श्री मोहन लाल बंदूनी डिग्री कॉलेज में कार्यरत थे किंतु पुरोहित का कार्य भी करते थे उसके बाद मेरा बड़ा भाई जो भले ही फरीदाबाद में बहुत बड़ी कंपनी में था फिर भी उसने अपनी पंडिताई को कभी नहीं छोड़ा इसलिए अपने क्षेत्र में पारंगत भाई ने गोत्राचार के बाद जल्दी ही कन्यादान की ओर बढ़ा दिया।
  वधु के पिताजी द्वारा संकल्प सहित वधु का अंगूठा शंख समेत वर यानी मेरे भाई के हाथ में दे दिया। वधु के मां पिता जी थोड़े रुआंवे से तो लगे क्योंकि उनकी यही अकेली बेटी है लेकिन क्या करें कन्यादान तो सबसे बड़ा दान है जो बेटी की पिता को करना ही होता है और इसी के साथ पाणी ग्रहण संस्कार भी हो गया। इसके बाद वधु को मुकुट पहनाया गया क्योंकि अब वो लक्ष्मी के रूप में रहेगी। 

 फेरे
हॉल में ही वेदी बनी हुई थी जिसमें केले के पेड़ की टहनी उसके फल समेत थी। चारों कोनों पर दीपक जल रहे थे और बीच में अग्नि देव को प्रज्वलित किया गया। हमारे यहां की परंपरा में छः फेरों में दुल्हन आगे रहती है और सातवें फेरे में दूल्हा आगे आता है।प्रत्येक फेरे में दुल्हन का भाई अपने हाथों से दुल्हन के सूप में धान की खील डालता है जिसे दुल्हन फेरे लेते समय धीरे धीरे सूप से फटकती हुई अग्नि में गिराती है। 
छठे फेरे में सिल बट्टे का भी प्रयोग था जिसमें 7 छोटी बत्तियां जल रही थीं। वर ने वधू के कंधे पर बायाँ हाथ रखकर, दायें हाथ से वधू के पैर को बट्टे पर रगड़ते हुए एक-एक कर छह बत्तियाँ बुझाई थीं और जो सातवीं बची थी उसे दूल्हा दुल्हन के ऊपर घुमाकर अग्नि के बीच में रख दिया। इसका अर्थ शायद इस तरीके से लिया जा सकता है कि जीवन के जितने भी कष्ट हों उन्हें साथ में कुचलकर आगे बढ़ जाएंगे और सातवीं दीपक की तरह प्रकाशमान रहेंगे। साथ ही सात जन्मों में अग्नि में राख होने के बाद भी हम हमेशा साथ ही रहेंगे। 
  सात फेरों के बाद सात वचन आए जिसमें पति पत्नी का धर्म बताया गया जिसे न केवल वर वधु ने ध्यान से सुना अपितु शादीशुदा लोगों के साथ कुंवारे लड़कों एवं लड़कियों ने भी ध्यानपूर्वक सुना। वर वधु ने तो सुनना ही था लेकिन हमने कान लगाकर इसलिए सुना कि क्या हमारे पति सात वचन निभा रहे हैं कि नहीं? और रही बात लड़के लड़कियों की तो शायद वो भी शादी के लड्डू अपने मन में खा रहे हों। 
   एक कारण और हो सकता है कि वहां बैठे सभी लोग इन वचनों को ध्यान से सुन रहे थे वो यह है कि पंडित जी यानी बड़े भाई ने खूब बढ़िया से इन वचनों को संस्कृत से हिंदी में अनुवाद करके बड़े ही व्यवहारिक तरीके से सुनाया जिससे कि पूरा माहौल ही हास परिहास और खुशनुमा हो गया। इसी के साथ वधु वर के बाईं ओर बैठ कर वामांगनी बन गई और अब इसी के आगे वर ने सोने की अंगूठी से वधु की मांग सुहाग के प्रतीक सिंदूर से भरकर दुल्हन का श्रृंगार करता है।
  मेरी छोटी बहन ने बड़ा ही सुंदर श्रंगारदान वधु को भेंट दिया जो बड़ा ही शाही था जिसे देखकर लग रहा था कि यह किसी राजकुमारी का होगा। सच कहूं तो मेरा मन भी ललचा रहा था उसे देखकर। खैर, मेरा नहीं तो क्या हुआ हमारे घर में तो इसने आना ही है। इसकी खुशी के साथ ही वर ने वधु का थोड़ा श्रृंगार करके इस रस्म को भी पूरा किया।
    फिर बारी आई 'जूठो-बिठो' की जिसमें वर वधु अपना जूठा लड्डू एक दूसरे को खिलाते हैं। वर के लिए तो लड्डू खाना आसान होता है लेकिन वधु के लिए पहाड़ी नथ के साथ खाना पीना मुश्किल होता है क्योंकि हमारे यहां नथ काफी बड़ी होती है इसलिए वधु का लड्डू का जूठा करना और जूठा खाना बड़ी चुनौती होती है और कई बार तो थोड़ी शर्म और झिझक से तो वधु और भी असहज हो जाती है लेकिन हमारे यहां तो हास परिहास का ऐसा माहौल बना कि वधु तो क्या वधु पक्ष के पंडित जी जो बहुत वृद्ध थे वे भी हमारे रंग में रंग गए और अपने मंत्र भी तेजी से बोलने लगे। इस खुशी के साथ ही सभी घर के बड़ो ने नए जोड़े को आशीर्वाद दिया।

गायदान
  इसी हंसी ठिठोली के बीच अब गाय दान का समय आ गया था। आज के समयानुसार शहरों में ब्राह्मण को गायदान करना थोड़ा असहज ही होता है इसलिए बस दक्षिणा देकर हर कार्य सिद्ध करा लिया जाता है। इस समय नव जोड़ा स्वयं भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की भांति माने जाते हैं इसलिए परिवारजन उनके पैर छूकर परिक्रमा करते हैं और भेंट प्रदान करते हैं। 
   वर का तो पता नहीं लेकिन इस क्षण में वधु को देखकर बिलकुल ऐसा प्रतीत हो रहा था कि कोई देवी ही बैठी है या कहो 'साक्षात लक्ष्मी'। वैसे गढ़वाल कुमाऊं की हर वधु मुकुट बांधने के साथ देवी ही प्रतीत होती है।
  उसके बाद सास भेंट हुआ जिसमें वर अपनी सभी सास के पैर छूता है और भेंट स्वरूप रुपए देता है जो वधु पक्ष दुगना करके वापस वर को दे देते हैं। 
  अब जब आशु(वर) को अपने जूते की याद आई तो इस समय मोनिका (वधु) पक्ष का पलड़ा भारी देखकर इसी लिफाफे को दुगुना क्या कई गुना बढ़ाकर भेंट स्वरूप सालियों को दिया गया। फिर भी मामला यहां भी सस्ते में ही निपट गया क्योंकि बताया था न कि सभ्य लोगों के लिए यह भी केवल एक शगुन था।

वधु प्रवेश
 इसी के साथ विदाई का समय आ गया लेकिन विदाई घर से होनी थी सो हम लोग वापस ऋषिकेश आ गए दुल्हन के स्वागत की तैयारी करने और केवल बड़ी दीदी को इसकी जिम्मेदारी दी गई जो दीदी ने निभाई और वधु जो अब हमारी ब्वारी (बहु) बन गई थी उसे उसके मायके से विदा कराकर ऋषिकेश ले आई। 
   उसके बाद तो फिर वधु का अपने ससुराल में पहुंचकर द्वार पर सास भेंट हुआ लेकिन यहां वर के सास भेंट की अपेक्षा वधु को थोड़ा अधिक मेहनत करनी होती है। सास, जेठानी, बड़ी नंद के पैर 5- 5 बार धोने पड़ते हैं। नई ब्वारी को देखकर थोड़ा दया तो आ रही थी कि बेचारी इतने भारीभरकम लहंगे के साथ बैठकर सास भेंट कैसे कर रही होगी लेकिन उसने मुस्कुराते हुए सास भेंट की जिसे देखकर तसल्ली हुई। 
इसके साथ ही साथ मुंह दिखाई की रस्म भी होती गई।
 और अब गणेश पूजन के सम्मुख बैठ कर हाथ के कंगण (मौली धागा) भी खोल दिए गए।
  घर में नई बहू का स्वागत पहले ननदों द्वारा द्वार रोक कर और शगुन का लिफाफा लेकर किया। उसके बाद आरती और शुभ रोली के पद चिन्हों द्वारा किया गया। अगले दिन पंदेरा (जल का प्राकृतिक स्रोत) पूजन भी था। गढ़वाल में पानी का प्राकृतिक स्रोत होता है जहां से जल भरा जाता है इसी स्थान को पंदेरा कहा जाता है लेकिन यहां शहरों में नल पर ही जल देवता की पूजा की जाती है। धूप दीप, रोली मौली के साथ कच्चे चावल उड़द दाल के दाने और सिक्के पंदेरा के स्थान पर रख कर घर की खुशहाली के लिए प्रार्थना की जाती है और साथ में आई ननद को शगुन भी दिया जाता है। और इसी शुभ घड़ी के साथ हमारी नई बहू मोनिका अब हमारे बडोनी परिवार का हिस्सा बन गई। 



   परिवार के कुछ लोग और कुछ शुभचिंतक इस शुभ घड़ी में साथ नहीं थे उन्हें बहुत याद किया और जो साथ में थे उनके सहयोग तो हमेशा ही स्मरणीय रहेगा। चूंकि विवाह बहुत बड़ा कार्यक्रम होता है इसलिए किसी कारणवश शायद कहीं भूलचुक होना समान्य है बाकी हमारे इतने बड़े परिवार वालों और शुभचिंतकों की शुभकामनाओं के सामने ये छोटी मोटी बाते मायने नहीं रखती इसलिए सभी का हृदय से धन्यवाद। कुछ और भी रस्में हो सकती हैं जिन्हें मैंने शायद भूलवश नहीं लिखा। इसके लिए क्षमा। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि अब नवविवाहित जोड़ा (आशुतोष और मोनिका) अपने इस बडोनी परिवार मे सदैव खुश रहें और सुखी रहें।

एक -Naari

Comments

  1. बहुत सुंदर। ऐसा लग रहा है कि शादी में सम्मिलित होकर आए है
    नवविवाहित जोड़े को ढेर सारी शुभकामनाएं।

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  2. Maza aa gaya pad kar, n u are looking so gorgeous

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  3. Sach mei gadhwali shadi ki rangat nazar aa aa gai...bahut sunder.

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  4. Many many congratulations Reena ..God bless the new couple ...beautifully written ....

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  5. Bahut sunder bahut bahut badhai ❤️❤️

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  6. Bahut badhiya Reena 👌👌👌 beautifully discribed...Hum log marriage to attend nhi kar paye lekin tumhare blog se laga ki humne shadi ka har ek moment jiya.I am proud of u my little sis...luv u 😍 .May God bless you,may God give u succes in your life
    And many many congratulations to new married couple.

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  7. सच में रीना इतना सुंदर लिखा है मैं तो फिर दोबारा से शादी में ही पहुंच गई हूं।

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  8. Bahut sunder ..... Newly married couple ko lots of congratulations 👏👏👏🎉🎉🎉🎉🎉🎉 ishwar ki kripa sadaiv bani rahe

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  9. Bahut sunder, esa laga ki maine shadi attend kar li ❤️❤️

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  10. ऐसा प्रतीत हो रहा मानो हम भी साक्षी हो इस विवाह के ...बेहतरीन ..नव वर वधू को असीम शुभकामनाएं

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  11. Shaandaar lekhan...aisa laga ki hum aapke sath hi is shadi mein hain. Har ek line padhte hue maza aaya

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  12. बहुत बढ़िया ✌️✌️✌️✌️✌️

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  13. आप सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएं

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  14. बहुत सुंदर और विस्तृत लेख॥ मज़ा आ गया पढ़ कर!! ढेर सारी शुभकामनाएं नवविवाहित जोड़े को. रीना बहुत सुंदर लग रही थी सभी दिन॥

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