क्योंकि बहु भी तो सास बनेगी…

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क्योंकि बहु भी तो सास बनेगी... माँ, आज घर लौटते हुए थोड़ी देर हो जायेगी... आईने में लिपस्टिक लगाते हुए रंजना ने अपनी सास लता से कहा। क्यो?? आज कुछ खास है क्या??  माँ, वो आज ऑफिस मे सिन्हा जी की रिटायरमेंट पार्टी है और आपको तो पता ही है कि ऑफिस में इसकी  जिम्मेदारी मेरी रहती है। इसलिए आज जल्दी जा रही हूँ ताकि पार्टी के साथ साथ अपना ऑफिस का काम भी जल्दी निपटा लूं।  गाड़ी की चाबी थामे रंजना तेजी से बाहर निकलती है...   अरे,नाश्ता तो कर ले...  नाश्ता वही कर लूंगी... अच्छा तो कम से कम कुछ फल तो ले जा और सुन, इन्हें याद से खा लेना। काम के चक्कर में भूल मत जाना।(रंजना के बैग में फल का डिब्बा डालते हुए लता बड़बड़ाते हुए कहती है ) हमेशा जल्दी में रहती है ये लड़की.. हाँ हाँ पक्का, चलो बाय मां,  बाय दादी।  बाय मां,  बाय दादी, उन्हु। (आंगन मे बैठी दादी ने नाक सिकोड़कर कहा।) न जाने क्या हो गया है आज कल की बहुओं को। न कोई शर्म न कोई लाज। ये मर्दाना कपड़े पहनो, गाड़ी दौड़ाओ, रात को घर देर से आओ और ऊपर से चूल्हा चौके की तो बात ही न करो इनसे।   आजकल की बहुओं को चा...

सर्दी...शादी...स्वेटर..

   सर्दी...शादी...स्वेटर.. 
   शादियों का मौसम है और वो भी सर्दियों में। दुल्हा, दुल्हन बरात, मेहंदी, हल्दी, फेरे, विदाई, दावत, ढेर सारी जगमगाती रोशनी और उन रोशनियों में चमकते चेहरे। 
  अब दुल्हा दुल्हन के चेहरे की चमक का तो कोई जवाब ही नहीं है। ये उनकी खुशियों की प्राकृतिक चमक है जो उनके चेहरों से अधिक उनकी आँखों में होती है। साथ ही परिवारजन और शुभचिंतकों की खुशियों में भी कोई कमी नहीं होती खासकर कि महिलाओं और युवतियों की जिनकी खुशियों में इतनी गर्माहट होती है कि चाहे कितनी भी ठंड हो बिना स्वेटर या किसी भी गर्म कपड़ों के हर शादी चल जाती है।

    जहाँ आदमी और लड़के लोग सूट, स्वेटर, जैकेट, शाल पहने उनके इस साहस को देखकर हैरान होते हैं तो वहीं वृद्ध माताएं तरह तरह के ज्ञान देकर उन्हें घुडाकानें से भी नहीं चूकती। लेकिन क्या करें शादी की चकाचौंध की जो गर्माहट होती है वो बहुत ही नर्म और मखमली होती है  जिसके बीच सच में ठंडक गायब हो जाती है जिसे केवल महिलाएं ही समझ सकती है। और अगर आप उन्हें समझना चाहते हैं तो उसके लिए आपके पास भी उतना उत्साह होना चाहिए जितना कि एक शादी में जाने के लिए लहंगे, साड़ी, आभूषण, मेकअप और बालों को सजाते समय महिलाओं के पास होता है। 

   शादी की रस्मों और उनकी खुशियों के बीच भारी भरकम लहंगे, साड़ी, मैक अप का उत्साह किसी भी ठंड को काट देता है। इसीलिए अमूमन सामान्य ठंडियों के दिनों में स्वेटर, शाल, टोपी, मोजे पहनने वाली महिलाएं भी अपने उत्साह से शादी की रौनक में इन गर्म कपड़ों से परहेज कर लेती हैं और अपने पहनावे या साज सज्जा से किसी भी प्रकार का कोई समझौता नहीं करतीं। 
    वैसे ठंड या गर्म का आभास हमें दिमाग के द्वारा भेजे गए संकेतों से होता है। जब बाहर के वातावरण और शरीर के तापमान में अंतर आता है तब हमें ठंड या गर्मी का आभास होने लगता है जैसे कि अगर शरीर का तापमान बाहर के तापमान से अधिक होता है तो हमें ठंडा लगती है तब शरीर स्वयं अपनी ऊर्जा बनाकर शरीर का तापमान संतुलित करता है और ऐसे ही जब शरीर का तापमान बाहर के तापमान से अधिक होता है तो हमें गर्मी लगती है। अब ये तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण है लेकिन असल में शादी के ये दिन खुशियों के दिन होते हैं जो महिलाओं को ऊर्जा से भर देते हैं और उनकी यही ऊर्जा उन्हें ठंड से बचाने का काम करती है। उनकी ऊर्जा खाने पीने से लेकर सजने संवरने तक खूब फलती फूलती हैं। इन उत्सवों के प्रति उनका जोश और उत्साह उनकी ऊर्जा को और बढ़ा देता है इसीलिए ठंड में भी हम महिलाओं और युवतियों को बिना ऊनी कपड़ों के भी देख सकते हैं। 
    दूसरा कारण ये भी है कि विवाह या ऐसे उत्सवों में खूब लोग इकट्ठा होते हैं, सभी नाते रिश्तेदारों के साथ साथ शुभचिंतकों का भी आना होता है। सभी उत्साह की उष्मा लिए मिलते हैं इसलिए भी ज्यादा लोगों के बीच सर्दी से बचाव हो जाता है और फिर जब विवाह के इन उत्सवों  में खूब नाच गाना होता है तो शरीर की ऊर्जा अपने आप गर्माहट बनाए रखती है। तभी तो वरमाला के बाद जब धीरे धीरे लोग अपने गंतव्य को जाने लगते हैं और नाच गाना भी कम हो जाता है तो सुंदर चमकदार कपड़ों पर स्वेटर या शाल की ओढ़नी भी आ जाती है और साथ ही कठिन तप को पूर्ण करने की संतुष्टि भी। 
एक -Naari
    

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