क्योंकि बहु भी तो सास बनेगी…

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क्योंकि बहु भी तो सास बनेगी... माँ, आज घर लौटते हुए थोड़ी देर हो जायेगी... आईने में लिपस्टिक लगाते हुए रंजना ने अपनी सास लता से कहा। क्यो?? आज कुछ खास है क्या??  माँ, वो आज ऑफिस मे सिन्हा जी की रिटायरमेंट पार्टी है और आपको तो पता ही है कि ऑफिस में इसकी  जिम्मेदारी मेरी रहती है। इसलिए आज जल्दी जा रही हूँ ताकि पार्टी के साथ साथ अपना ऑफिस का काम भी जल्दी निपटा लूं।  गाड़ी की चाबी थामे रंजना तेजी से बाहर निकलती है...   अरे,नाश्ता तो कर ले...  नाश्ता वही कर लूंगी... अच्छा तो कम से कम कुछ फल तो ले जा और सुन, इन्हें याद से खा लेना। काम के चक्कर में भूल मत जाना।(रंजना के बैग में फल का डिब्बा डालते हुए लता बड़बड़ाते हुए कहती है ) हमेशा जल्दी में रहती है ये लड़की.. हाँ हाँ पक्का, चलो बाय मां,  बाय दादी।  बाय मां,  बाय दादी, उन्हु। (आंगन मे बैठी दादी ने नाक सिकोड़कर कहा।) न जाने क्या हो गया है आज कल की बहुओं को। न कोई शर्म न कोई लाज। ये मर्दाना कपड़े पहनो, गाड़ी दौड़ाओ, रात को घर देर से आओ और ऊपर से चूल्हा चौके की तो बात ही न करो इनसे।   आजकल की बहुओं को चा...

गांधीवादी से गांधीगिरी तक!!

गांधीवादी से गांधीगिरी तक!!
  गांधी जी के बारे में इतना लिख और पढ़ चुके हैं लोग कि अब और कुछ बचा नहीं है बताने को तभी तो आज अगर पूछा जाए कि ऐसा कौन है जो गांधी को सुनना, देखना या पढ़ना पसंद करता हो तो जवाब में बहुत कम ही लोग हामी भरेंगे। उनके विषय में आज शायद सबके अपने अपने विचार और तर्क होंगे लेकिन राष्ट्रपिता तो वही हैं।
   अब भले ही लोग गांधी से प्रेम करें या न करें लेकिन गांधी जयंती से प्रेम तो करते ही हैं क्योंकि इस दिन अवकाश का आनंद जो मिलता है और अवकाश का आनंद तो दोगुना तब हो जाता है जब अगले दिन भी शनिवार या रविवार हो। 
  इस बार भी ऐसा ही योग बना है कि अब छुट्टी का मजा दो दिन तक रहेगा लेकिन क्या हम भी गांधी जयंती में गांधी जी को याद करेंगे?? ये भी सोचना पड़ेगा न!!

    आज समय के साथ भले ही बहुतों के मन से गांधीवादी विचार धुल रहे हों लेकिन उनकी अहिंसक छवि मिटी नहीं है और आज भी जब बच्चा उनके चित्र के सामने खड़े होकर पूछता है कि ये कौन है?? तो हमारे मुंह से एक सुर में निकलता है 'राष्ट्रपिता महात्मा गांधी'। इसलिए ये तो मानना ही पड़ेगा कि हमारे अंदर किसी कोने में गांधी नाम न भी हो लेकिन गांधीवाद तो है ही। 
   और इसी गांधीवाद के लिए दो अक्टूबर के दिन उनके चरित्र के लिए, विचार के लिए, सत्य के लिए, समर्पण के लिए, सेवा के लिए, त्याग के लिए, सादा जीवन के लिए घंटो नहीं लेकिन कुछ मिनट के लिए महात्मा गांधी जी को याद करना चाहिए। 
   भले ही उनकी कोई किताब (सत्य के साथ मेरे प्रयोग, मेरे सपनों का भारत, हिन्द स्वराज)पढ़ी जाए, या फिर उनका प्रिय भजन (वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीर पराई जाणे रे )सुना जाए या गुनगुनाया जाए, या फिर गांधी आश्रम की कोई वस्तु ली जाए या खादी पहनी जाए और कुछ नहीं तो लगे रहो मुन्नाभाई या मुन्नाभाई एमबीबीएस ही देखी जाए जहां मुन्ना भाई भी गांधीवादी को अपनाकर गांधीगिरी तक पहुंच गया था और अपनी हर मुश्किल का हल उसनेे निकाल ही लिया था। इसलिए इस गांधी जयंती के अवकाश में भले ही कुछ समय लेकिन गांधीदर्शन के लिए या तो गांधीवाद नहीं तो गांधीगिरी अपनाई जाए।


एक - Naari

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