Old Days...Old Friends

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    पुराने दोस्त इत्र की तरह होते हैं जितने पुराने होते हैं उतने ज्यादा महकते हैं। उनके साथ बिताए पल तो वापिस नहीं आ सकते लेकिन उन पलों की महक जरूर ली जा सकती है इसीलिए तो... आज वहीं पुराने दिन,,मैं वही पुराना यार ढूँढता हूँ उम्र को थाम ले जो...वो बचपन वाला यार ढूँढता हूँ। प्यारी से मुस्कुराहट में,  उन कोमल सी गलबाहों में,  छोटे से नदी तालाबों में, बड़े चौक-चौबारों में,  घास की घाटी में  या ऊँची किसी अटारी में...  आज वही पुराने दिन,,मैं वही पुराना यार ढूँढता हूँ।  कुंडी खड़काते मोहल्लों में,  बेवजह भागते गलियों में,  दौड़ लगाते बंजर मैदानों में या...  गिरते संभलते उन शाखाओं में,,,  आज वही पुराने दिन,,मैं वही पुराना यार ढूँढता हूँ।  बे लगाम झूलों की पींगो में,  कागज की नौका-जहाजों में,  क्रिकेट के टूटे बल्लों में या...  गप्पों की हवाइयों में,,,  आज वही पुराने दिन,,मैं वही पुराना यार ढूँढता हूँ।  बेतुके वाले शेरों में,  फालतू भरी शायरी में,  भाड़े की रंगीन कॉमिक्सों में, साबू, चाचा, नागराज में  या...  बिल्लू पिंकी के किरदारों में,,,  आज वही पुराने दिन,,मैं वही पुराना दोस्त, ढ

बद्रीनाथ धाम: यात्रा वर्णन

बरसात में बद्रीनाथ यात्रा... 


   एक दिन में तीन तीन बार मौसम का हाल (weather forecast) देख चुकी हूँ और हर बार शंका होती है कि यात्रा पर जाना सही है या नहीं? क्योंकि मौसम विभाग कल से लेकर पूरे हफ्ते तक बारिश दिखा रहा है और वैसे भी मानसून आ गया है और ऐसे मौसम में दिमाग में बस यही चल रहा है,,,"बारिश के मौसम में जाना सही होगा!! "
और जितनी बार अपने मन की बात विकास को बताऊँ उतनी बार बस एक ही जवाब मिले, " देखो कहाँ तक जाया जा सकता है। कल की कल देखते हैं। "
   मेरे मन में तो बहुत कुछ चल रहा था क्योंकि मैं थोड़ा आगे पीछे देखकर, अपनी गणित करती रहती हूँ लेकिन विकास का कुछ अलग ही विश्वास है। उनके दिमाग में जो बैठ जाता है फिर उसके अलग जाना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। उनको भगवान बद्रीनाथ जी के दर्शन करने थे और माँ को पवित्र धाम ले जाना था सो इसके अलग कुछ और दिमाग में था ही नहीं।
   अगली सुबह जल्दी निकलना था क्योंकि बद्रीनाथ जी के दर्शन से पहले माँ धारी देवी के दर्शन और पूजा करनी थी। इसीलिए अलार्म तो लगा दिया लेकिन जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि कहीं भी जाना हो महिलाओं का अलार्म तो उनके दिमाग में फिट हो जाता है जो रात भर घड़ि घड़ि बजता रहता है और 'जागते रहो' का संदेश देता रहता है। खैर! जो भी हो बादल तो रात से ही लगे थे जो सुबह सुबह फुहारों के साथ बरसने भी लगे इसलिए जल्दी जल्दी करते भी बच्चों के साथ आखिर 6:30 बजे के आसपास घर से बाहर तो निकल ही गए।

 
  मौसम तो बिल्कुल डरा रहा था क्योंकि रिमझिम वाली फुहारें अब घनघोर बादलों में बदल चुकी थी। मौसम को देखकर मन में एक बार फिर से सिंहरन हुई क्योंकि एक तो बारिश ऊपर से पहाड़ी रास्ता और इन सबके साथ लगभग 330 किलोमीटर का लंबा रास्ता! लेकिन विकास के सामने सब कुछ गायब था और यहाँ तक कि हमारी बात भी। इसलिए माँ और मैंने तो चुपचाप रहने और सब भगवान भरोसे छोड़कर गाड़ी में बैठने की तैयारी कर ली। हमारी तो बद्रीनाथपुरी की यात्रा थी लेकिन बच्चों का अलग ही एडवेंचर टूर था इसलिए सुबह साढ़े छः बजे से ही मस्ती मूड में आ गए। एक दिन पहले से ही कचर पचर, नमकीन, जूस, फ्रूटी, ऑरेंज कैंडी, जेली कैंडी, कॉफी कैंडी और पता नहीं तरह तरह खट्टी मीठी गोलियां और बिस्कुट सब ले ली। यहाँ तक कि अपनी दीदी के साथ साथ जय भी अपनी पूरी डिमांड के साथ चविंग्म भी रखवा ली।
जून के अंतिम दिन थे इसलिए यात्रा मार्ग पर ट्रैफ़िक में थोड़ी राहत थी नहीं तो सुबह हो या शाम यात्रा मार्ग हमेशा गाड़ियों से भरा होता है। चौक से बाहर निकलते ही बारिश खूब जोर शोर से हमारा स्वागत करने लगी थी जो ऋषिकेश पहुँचने पर ही थोड़ा शांत हुई लेकिन मन अभी भी दर्शन की ललक और मौसम के डर के बीच हिचखोले खा रहा था क्योंकि तपोवन के बाद से ही रास्ते में छोटे बड़े पत्थर दिखाई दे रहे थे जो आधी सड़क तक बिखरे हुए थे। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे अभी अभी पहाड़ से दरक कर रास्ते में लुढके हुए हो।

  वैसे तो बारिश का मौसम सुहावना होता ही है लेकिन बरसात में पहाड़ों का सौंदर्य कुछ अलग ही होता है। इस मौसम में पहाड़ बिल्कुल नए नए ताजगी भरे लगते हैं। ऐसा लगता है कि पहाड़ों की सारी हरियाली नहा धोकर सामने बिखर गई हो।



 पहाडों पर फैला कोहरा गर्मियों में एकदम वनीला आइसक्रीम जैसा लगता है जिसे  देखकर मन अपने आप ठंडा हो जाता है। लेकिन ये खूबसूरती दूर से देखने में ही अच्छी लगती है हकीकत में यहाँ के पहाड़ जितने खूबसूरत हैं उतने ही कमजोर भी इसीलिए बारिश में दरकते भी हैं और टूटकर छोटे बड़े पत्थर/ बोल्डर के रूप में उपर से नीचे गिरते भी हैं। इसलिए मेरे लिए तो सड़क पर पड़े पत्थरों को देख देख कर सामने वाले पहाड़ों की हरियाली भी गायब हो रही थी।
  एक और कारण था जो इस खूबसूरती के बजाए मुझे चिंता में डुबो रहा था और वो था टायर का पंचर होना क्योंकि पत्थरों पर गाड़ी चलाते चलाते टायर फट भी जाते हैं और हमारे सामने ही कितनी ही पंजाब, चंडीगढ़, हरियाणा और दिल्ली की गाडियाँ सड़क किनारे टायर बदल रही थी। इन्हीं गाड़ियों को दिखने का कारण शायद ये भी हो कि ये लंबा सफर करती हुई आई हो या फिर ये बिना देखे पूरी तेजी से इन नुकीले पत्थरों पर चढ़ा दी जाती हो! लेकिन ये भी सच है इन्हीं PB, CH, HR, DL, UP16 प्लेट की गाड़ियां ही इस मार्ग पर दिखी बाकी उत्तराखंड यूपी की गाड़ियां तो चल रही थी लेकिन उनकी गिनती बहुत ही कम थी।
  खैर, डर तो लग रहा था लेकिन अंदर से मैं पक्का भी हो रहा था कि धारी देवी माता के दर्शन तो करने ही है इसलिए विकास बड़ी ही सावधानी से इन पत्थरों से बचाते हुए गाड़ी चला रहे थे। कौड़ियाला पार करके संकडीधार फिर सौडपानी और फिर तीन धारा सब पार कर लिया और लगभग 9:15 के आस पास हम देवप्रयाग पहुँच गए। बच्चों को नदी देखनी थी और यहाँ पर तो नदियों का संगम है जो मुख्य सड़क से ही दिखाई दे जाता है इसलिए कुछ मिनट रुककर दूर से ही इस दिव्यस्थान को प्रणाम किया क्योंकि हमें धारी देवी दर्शन करके आगे भी बढ़ना था और उसके बाद ही कुछ खाना भी था।

(हरी नीली भागती भागीरथी, शांत बहती मटमली अलकनंदा) 
 
  देवप्रयाग में हिमालय से निकलने वाली अलकनंदा और भागीरथी नदी का संगम होता है। माना जाता है यहाँ तीसरी नदी गुप्त सरस्वती का भी मिलन होता है। इन नदियों के संगम के बाद ही संयुक्त रूप से गंगा नदी कहलाती है। देवप्रयाग के इस संगम की सनातन धर्म में बड़ा ही धार्मिक महत्व है। यहाँ जोर शोर से भागती भागीरथी और शांत स्वरूप में बहती अलकनंदा को आसानी से पहचाना जा सकता है। गढ़वाल में अपनी मान्यतानुसार भागीरथी को सास और अलकनंदा नदी को बहु माना जाता है । फोटो से भी आप बता सकते हैं,,
   बारिश अब कहीं भी नहीं थी इससे उलट जैसे जैसे हम आगे पहाड़ पर चढ़ रहे थे वैसे वैसे मौसम एकदम साफ होता जा रहा था लेकिन बस वही बोल्डर पत्थर दिख रहे थे। एक घंटे के अंदर हम देवप्रयाग से आगे मलैथा फिर सुंदर झील बने श्री यंत्र टापू और उसके बाद श्रीनगर पहुंचे। साढ़े दस तो बज गए थे अब अंदाज़ा लगा लिया कि 11 बजे तक आराम से धारी देवी पहुँच जायेंगे क्योंकि अब सड़क आल वेदर रोड़ की तर्ज़ पर सड़क अच्छी और चौडी भी हो गई हैं।


  वैसे भी श्रीनगर गढ़वाल पहुँचते ही तस्सली होने लगती है कि अब जल्दी ही धारी देवी भी पहुँच जायेंगे क्योंकि यहाँ से धारी देवी 12-14 किलोमीटर है और 20-25 मिनट में वहाँ पहुंचा जा सकता है। इसलिए मन में अब शांति थी कि शीघ्र ही देवी दर्शन होंगे लेकिन ये क्या, श्री नगर से थोड़ा ही आगे बढ़े थे कि चमधार में उपर से छोटे छोटे पत्थर गिर रहे थे इसलिए पुलिस गाड़ियों को लाइन में लगाकर धीरे धीरे आगे बढ़ा रही थी। बस अब फिर से मन में हलचल होने लग गई। फिर से तरह तरह के विचार मन में शंका डालने लग गए। डर लग रहा था कि अभी तो बद्रीनाथ जी का आधा रास्ता भी पार नहीं किया है और यहीं से रोड़ का हाल बुरा हो गया है तो आगे जाने क्या होगा!!सोच में पड़ने वाली बात तो है ही क्योंकि बरसात में पहाड़ों पर कई जगह सड़क मार्ग टूट जाता है और कभी कई- कई घंटो क्या पूरे दिन तक भी संपर्क नहीं हो पाता और फिर दूसरा इन बच्चों और माँ के साथ तो बीच रास्ते रुका नहीं जा सकता न!!
  अब तो बस लगन थी तो धारी देवी तक ही पहुँचने की क्योंकि हम बहुत पास थे लेकिन आगे जाकर ही पुलिस ने बिना सुने गाड़ी को कलियासौड जहाँ देवी मंदिर है वहाँ के बजाय एक दूसरे मार्ग जो पीछे पीछे से सीधा खाँकरा जाता है उस मार्ग पर भेज दिया क्योंकि धारी देवी के आगे सीरोबगड़ में सड़क टूटी हुई थी इसलिए सारा यात्रा रूट खाँकरा होते हुए ही भेजा जा रहा था। यह मार्ग भी थोड़ा कच्चा लग रहा था शायद बरसात से जगह जगह रोड़ भी टूट गई थी। अब यहाँ से हमें थोड़ा चार धाम यात्रियों का पता चला क्योंकि यहाँ गाड़ियों की लाइन लगी हुई थी जो धीमी गति से चल रही थी। दिल फिर से बैठा जा रहा था और दुखी भी हो रहा था क्योंकि इस मार्ग से आगे जाने का मतलब था कि सीधा बद्रीनाथ के मार्ग पर पहुंचना और हमारी यात्रा तो धारी देवी दर्शन के बाद ही आरंभ होनी थी। इस मार्ग से मुड़कर धारी देवी नहीं आया जा सकता था क्योंकि खाँकरा से धारीदेवी जोड़ने वाली जगह तो सीरोबगड़ ही थी।
 
    हम आगे बढ़ तो रहे थे लेकिन मन तो धारी देवी पर ही रुक गया था। लेकिन क्या करते दूसरा और कोई चारा भी नहीं था इसलिए बस ऐसे ही आगे बढ़ते गए। कुछ दूरी पर जाकर हमारी गाड़ी जो कछुए  की चाल में चल रही थी उसमें भी ब्रेक लग गए क्योंकि आगे का मार्ग भी टूट गया था इसलिए सारी गाड़ियों का काफिला अब वहीं थम चुका था।
   गाड़ी मे बैठे बैठे कोफ़्त हो रही थी और ऊपर से दो छोटे बच्चे जो घडी घडी 'हम कब पहुंचेंगे' का राग अलाप रहे थे उनसे बचकर थोड़ा बाहर तो निकले लेकिन पहाड़ की उमस के कारण फिर से गाड़ी में बैठना ही पड़ा।
    आधे पौने घंटे बाद दूसरी ओर से गाड़ियां आने लगी थी तो हम भी आगे बढ़ने लगे लेकिन थोड़ी ही दूरी पर पता चला कि ये गाड़ियां तो हमारी ही लेन की हैं जो मोड़ कर वापस  मुख्य मार्ग पर जा रही थी। अब इस टूटी सड़क का तो पता नहीं था कि कब तक सही हो और दूसरा कि इस जगह पर फंसना मतलब कि खाने पीने से भी दूर होना क्योंकि आसपास कोई भी दुकान नहीं थी इसलिए हमने भी गाड़ी मोड़कर वापस उसी जगह जाने की सोची जहाँ के लिए हम निकले ही थे।
     अब हम मुख्य मार्ग पर धारी देवी मंदिर की ओर ही बढ़ रहे थे। यहाँ मुख्य मार्ग बस और गाड़ियों की कतार से भरा हुआ था और हाँ आगे आगे तो बड़े बड़े ट्रक और लोडर भी लाइन में खड़े थे। वहाँ कितने ही लोग अपनी बस से नीचे आसन लगा कर बैठे हुए थे और कितने ही यहाँ वहाँ भटक रहे थे। इन्हें देखकर लग रहा था कि सड़क लंबे समय से टूटी हुई थी। बस हमने भी गाड़ी किनारे की और पैदल मंदिर की ओर प्रस्थान किया। माँ धारी देवी का मंदिर सड़क से ही नज़र आ रहा था। मुख्य मार्ग से मंदिर नीचे ढलान में है जहाँ झील बनी है इस झील के ऊपर एक छोटे पुल से मंदिर तक पहुंचा जाता है  इसलिए वहाँ से नीचे उतरते समय थोड़ा सावधानी भी रखनी थी। झील के ऊपर बने मंदिर की ओर बहुत से यात्री भी जा रहे थे। मुख्य सड़क पर तो होटल, लॉज, रेस्टोरेंट सब है लेकिन नीचे ढलान पर छोटी मोटी चाय पानी और पूजा से संबंधित दुकाने ही हैं और हाँ खेल खिलौनो की भी दुकान है जिसे देखकर तो बस जय की खुशी का ठिकाना नहीं रहा लेकिन उसे बस देखकर ही संतोष करना पड़ा। 
 
  धारी देवी मंदिर श्री नगर गढ़वाल से 14 किलोमीटर की दूरी पर एके डैम के बीच स्थित है। चारों और सुंदर पर्वतों से घिरी घाटी में स्थित यह मंदिर गढ़वाल के प्राचीन और सिद्ध मंदिरों मे से एक है। यह देवी काली का मंदिर है और हम लोगों की इस मंदिर में बहुत आस्था है। धारी देवी उत्तराखंड की संरक्षिका मानी जाती है और चार धाम जाने वाले यात्रियों की रक्षा देवी भी। यहाँ माता का केवल मुख ही मूर्ति के रूप में स्थित है निचला भाग रुद्रप्रयाग के कालीमठ में माँ मैठाणा के नाम से पूजा जाता है। यहाँ माता की मूर्ति का स्वरूप दिन में तीन बार बदला हुआ नज़र आता है। धारी देवी में माता का रूप सुबह कन्या, दिन में युवती तो शाम को वृद्धा के रूप में  प्रतीत होता है।
 
2013 में उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा तो याद होगी जब 16-17 जून को लगातार बारिश से पूरे गढ़वाल में हाहाकार मच गया था। इसके पीछे चाहे कोई भी वैज्ञानिक कारण हो लेकिन यहाँ के स्थानीय लोगों की धारणा कुछ अलग ही है। माना जाता है कि केदारनाथ की आपदा के पीछे भी धारी देवी की मूर्ति को अपने मूल स्थान से हटाना था। 303 मेगावाट की जल विद्युत परियोजना के कारण डैम बनना था तो इस मंदिर को भी वहाँ से ऊपर उठाया गया और 16 जून को ही जब मूर्ति को उसके मूल स्थान से उठाया गया तो कुछ घंटों के बाद ही माता का रुष्ट रूप दैवीय आपदा बनकर केदारनाथ में बरस पड़ा जबकि स्थानीय लोग कहते हैं कि दो घंटे पहले तक तो मौसम बिल्कुल सामन्य था।
यह भी कहा जाता है कि एक स्थानीय राजा ने भी 1882 के दौरान माँ धारी देवी को उनके मूल स्थान से हटाने की कोशिश की थी और उसके परिणामस्वरूप उस समय भी केदारनाथ में भूस्खलन हो गया था।
  अब इसे जो भी माने या कहें लेकिन एक बात तो सत्य है कि इस मंदिर में आने पर आपको एक अलग शक्ति का अहसास तो जरूर होगा। मूर्ति के सामने बैठकर पूजा करने पर आपको साक्षात अनुभव होगा कि माँ काली सामने बैठी है और सब सुन रही है। ऐसा मेरा अपना अनुभव भी है इसलिए हमारी धारी देवी के प्रति बहुत श्रद्धा है।
  वैसे तो यहाँ कम लोग ही आया करते हैं लेकिन आज थोड़ी भीड़ अधिक थी। आज यहाँ केवल उत्तराखंड के ही नहीं अपितु अलग अलग बोली भाषा वाले लोग भी पहुंचे थे शायद ये सभी आगे जाने वाले रहे होंगे जिनकी गाडियाँ रास्ते में खड़ी थीं। लेकिन सभी ने अच्छे से दर्शन किए और हमारी पूजा भी अच्छे से संपन्न हुई। अब समय हो गया था लगभग साढ़े बारह।

 
  सुबह से कुछ खाया नहीं था और रोड़ भी अभी बंद थी।  इसलिए पूजा पाठ के बाद पेट पूजा करना ही उचित समझा। चूंकि अब दर्शन हो चुके थे तो प्रसाद भी खाया और तस्सली से खाना भी। 100रुपए की थाली में भरपेट खाना खाया गया जबकि वही थाली किसी फैन्सी रेस्त्रां में पूरी अकेले खाना बस की बात नहीं होती। खाना साधारण था लेकिन अच्छा था और भूख भी थी इसलिए खाया भी गया। बच्चों को तो घर का खाना ज्यादा समझ नहीं आता लेकिन आइस क्रीम खिलाने के वादे पर थोड़ा मान भी गए। अब खाना भी खा लिया और आइस क्रीम भी और कुछ अच्छा भी लग रहा था। खाना पीना और बच्चों की मस्ती में घंटा भर लग गया और इसी के साथ दोपहर के 1:30 बज चुके थे।
    अब आगे क्या?? माँ मेरी ओर देखे और मैं विकास को ताकुं कि अब क्या करेंगे?? क्योंकि ढाबा वाले ने तो बोला की रोड़ ठीक होने में अभी तीन चार घंटे भी लग सकते हैं या पूरी रात भी। इसलिए या तो रोड़ खुलने की प्रतिक्षा करें, या फिर यही कही कमरा लेकर रात को रुका जाए या फिर वापस घर लौट जाए। मेरे दिमाग में तो सबसे आखिरी वाला विकल्प ही चल रहा था क्योंकि पहाड़ी रास्तों पर रात में गाड़ी चलाना मुझे जोखिम भरा लगता है और वो भी परिवार के साथ! और डर ये भी था कि अभी यही हाल है तो आगे की सड़कों का क्या होगा?? कहीं बीच रास्ते फस गए तो!! लेकिन इन सबसे परे विकास को तो जाना ही था,, इसलिए जवाब तो एक ही था... "देखो कहाँ तक जाया जा सकता है।"
  लेकिन अभी जाए तो जाए कहाँ और इस सड़क पर करें तो करें क्या?? इसका उत्तर तो हमें स्वयं ही खोजना था। इसी उधेड़बुन में गाड़ी में बैठ गए और सोचा की ये तो नेशनल हाईवे है। इसी में थोड़ा आगे बढ़कर देखते हैं कि कहाँ तक जाया जा सकता है। बस 10 मीटर ही आगे बढे थे कि पीछे से कोई दुपहिया वाहन में आया और हमें कहने लगा कि "खाँकरा का ऊपर वाला मार्ग खुल चुका है वहाँ से आगे बढ़ चलो।" हमारे लिए वो तो कोई फरिश्ता ही था नहीं तो हम सीरोबगड़ वाली सड़क खुलने के इंतज़ार में घंटो बैठे रहते या घर प्रस्थान कर लेते।
 
    ऊपर का मार्ग खुल चुका था। हम लोगों ने राहत की सांस ली और अब थोड़ा सकारात्मक संकेत भी मिल रहे थे। ऐसा लग रहा था कि ये सब धारी देवी ने हमारे लिए किया। वैसे तो सबका अपना अपना विश्वास होता है इसलिए हम भी सारी कड़ियाँ जोड़ रहे थे जैसे कि हमें यात्रा में सबसे पहले धारी देवी ही जाना था लेकिन पुलिस की बैरिकेडिंग ने हमारी गाड़ी को ऊपर वाले मार्ग पर भेज दिया क्योंकि उसी मार्ग पर गाडियाँ यात्रा के लिए आगे बढ़ रही थी। जैसे ही हम उस मार्ग पर बढे तो वो रास्ता भी बंद हो गया। ऐसे लगा कि धारी देवी का आदेश था कि "बिना मुझ से मिले आगे कैसे बढ़ सकते हो?" और वहाँ का मार्ग बंद हो गया जो कि कुछ समय पहले तक चल रहा था। जब वापस धारी देवी मार्ग पर आए तो किसी दरोगा ने हमें नहीं रोका जबकि पहले किसी भी गाड़ी को वहाँ से प्रवेश नहीं मिल रहा था क्योंकि उधर पहले से ही गाडियाँ लाइन में खड़ी थी। हमने दर्शन किए, माता को भेंट चढाई और देवी के सामने पुरोहित द्वारा की पूजा भी की।

   ऐसे लगा जैसे जब कोई बच्चा अपनी माता से लंबे समय बाद मिलने आता है तो माँ बच्चे को स्नेह से देखती है, तस्सली से पेट भरती है, उसकी थकान मिटाती है, उसकी ताकत बनती है। वैसा ही इस यात्रा में मुझे अनुभव हुआ कि उसी स्नेह के साथ बड़े आराम से खाना खाया, थकान मिटाई और हम सकारात्मक ऊर्जा से भर गए। ऐसा लगा कि माता ने उस आदमी को हमारे पास ही भेजा है क्योंकि वो किसी अन्य के पास गया ही नहीं और वो माता का संदेश लाया है कि "आगे की यात्रा का मार्ग हमारे लिए खुल चुका है।" इसी के साथ माँ धारी देवी को किया प्रणाम, माँ धारी देवी रक्षा करें, ऐसी कामना से आगे बढे। 
   समय था दोपहर के ठीक 1:40, हमें जाना है चार धाम में से एक बद्रीनाथ धाम। विकास ने मधुर मुस्कान के साथ अपनी गाड़ी की स्टार्ट और हम सभी ने साथ में कहा...बोल बद्री विशाल की जय!!  

 (आगे की यात्रा वर्णन...अगले अंक में।) 

एक - Naari
   
    

Comments

  1. Wah!!! Laga mai bhi aapke sath ghum Rahi hu bahut badhiya se describe Kiya aapne
    Santoshi(Riya Sharma)

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  2. Wow...I feel that I am also traveling with you... interesting..will wait for next travelogue..

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