गर्मी में प्रभु का धन्यवाद!!

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गर्मी में प्रभु का धन्यवाद!!    हम लोग न शिकायत बहुत करते हैं। कभी अपनो से तो कभी अपने आप से और जब कभी कुछ नहीं सूझता तो भगवान से ही शिकायत कर लेते हैं क्योंकि यहां तसल्ली मिलती है कि कोई सुने या न सुने लेकिन मेरा भगवान तो जरूर सुनेगा। अब इसे हम शिकायत समझे या फिर अपनी इच्छाएं ये तो भगवान ही जाने हम तो बस भगवान के तथास्तु की इच्छा रखते हैं लेकिन अपनी इच्छाओं के साथ आगे बढ़ते बढ़ते उस ईश्वर का धन्यवाद देना भी भूल जाते हैं जिसने हमेशा सहारा दिया है।       वैसे तो ईश्वर के आगे हम सभी नमन करते हैं लेकिन कभी कभी उसकी कृपा देर से समझ आती है। अभी पिछले शनिवार की ही बात है जब मुझे भी इस बात का अनुभव हुआ कि चाहे जो भी दिया है जितना भी दिया है उसके लिए ईश्वर का धन्यवाद है।    पिछले हफ्ते ही ऋषिकेश जाना हुआ लेकिन बिना अपनी गाड़ी के। काफी समय गुजर गया है किसी भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सेवाएं लेते हुए । कहीं भी जाना हो चाहे पास का सफर हो या दूर का अब अधिकतर अपना वहां ही प्रयोग होता है। भीड़भाड़ वाली जगह हो तो दुपहिया नहीं तो अपनी गाड़ी से ही चल पड़ते हैं। और जब न अपनी दुपहिया हो और न ही

जंगल: बचा लो...मैं जल रहा हूं!

जंगल: बचा लो...मैं जल रहा हूं!


   इन दिनों हर कोई गर्मी से बेहाल है क्या लोग और क्या जानवर। यहां तक कि पक्षियों के लिए भी ये दिन कठिन हो रहे हैं। मैदानी क्षेत्र के लोगों को तो गर्मी और उमस के साथ लड़ाई लड़ने की आदत हो गई है लेकिन पहाड़ी क्षेत्र के जीव का क्या उन्हें गर्मी की आदत नहीं है क्योंकि गर्मियों में सूरज चाहे जितना भी तपा ले लेकिन शाम होते होते पहाड़ तो ठंडे हो ही जाते हैं। लेकिन तब क्या हाल हो जब पहाड़ ही जल रहा हो?? उस पहाड़ के जंगल जल रहे हो, वहां के औषधीय वनस्पति से लेकर जानवर तक जल रहे हों। पूरा का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र संकट में हो!! उस पहाड़ी क्षेत्र का क्या जहां वन ही जीवन है और जब उस वन में ही आग लगी हो तो जीवन कहां बचा रह जायेगा!! 
    पिछले कुछ दिनों से बस ऐसी ही खबरें सुनकर डर लग रहा है क्योंकि हमारा जंगल जल रहा है। पिछले साल इसी माह के केवल पांच दिनों में ही जंगल की आग की 361 घटनाएं हो चुकी थी और इसमें लगभग 570 हेक्टेयर जंगल की भूमि का नुकसान हो चुका था। और इस साल 2022 में भी 20 अप्रैल तक 799 आग की घटनाएं सामने आ चुकी हैं जिसमें 1133 हेक्टेयर वन प्रभावित हो चुका है। जब अप्रैल में ये हाल है तो मई जून में क्या होगा!! अब ये तो चिंता का विषय होगा ही। क्योंकि मई से लेकर 15 जून तक तो मौसम बिलकुल शुष्क रहता है इसलिए जरा सी चिंगारी भी जंगल में विकराल आग का रूप ले लेती है। 
   इन सब समाचार से याद आता है 2016 का और पिछले वर्ष 2021 का भी जब उत्तराखंड के जंगल धूं धूं के जल रहे थे। ये आग उप-हिमालयी क्षेत्र की ढलानों पर से देवदार के जंगलों को जला रही थी फिर ये ओक और चौड़े जंगलों तक फैलती गई और हमारे कई हजार हेक्टेयर वन नष्ट हो गए। कुछ के लिए केवल वन ही नष्ट हुए लेकिन इन वनों के साथ केवल औषधीय पौधे ही नहीं अपितु कितने ही वन्य जीव-जंतु पक्षी सब के सब आग में स्वाहा हो गए। या फिर जंगली सुअर, बंदर, भालू, बाघ जैसे जानवर जंगल से गांव की बस्ती में भटकने लगे और मानव जीवन को क्षति पहुंचाने लगे।
   हम भले ही इन जंगलों और इन जंगली जानवरों से दूर अपने घरों में बैठे हैं लेकिन पहाड़ी हैं तो पहाड़ के दर्द से अनछुए कैसे रह सकते हैं और यहां बात केवल पहाड़ी होने की ही नहीं है और न ही ये समझा जाए कि वन केवल पशु पक्षियों का आश्रय या छाया मात्र है। ये वन ही तो मानव के लिए हवा, पानी, भोजन, लकड़ी, औषध के साथ साथ संरक्षण भी देते हैं। वन संसाधन पर्यावरणीय संतुलन के साथ आर्थिक रूप से भी हम मानवों को मजबूती देते है। 
   उत्तराखंड भी हिमालयी क्षेत्र में है और यहां के जंगल का जलना मतलब कि हिमालय के जैव विविधता का संकट में होना है। जंगल का जलना उन सभी के लिए भी एक संवेदनशील विषय है जो अपने लिए और अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए एक स्वस्थ वातावरण और उचित पारिस्थितिकी तंत्र की कामना करते हैं क्योंकि वनाग्नि केवल अपने आसपास की भौगालिक स्थिति को ही प्रभावित नहीं करती अपितु इसके प्रभाव से समस्त पर्यावरण और जलवायु पर भी पड़ता है। 

जंगल का अग्निकाल
   इन दिनों जो उत्तराखंड के जंगल में आग लगी है यह समय ही जंगल का अग्निकाल है जो फरवरी से आरंभ होकर 15 जून तक जब तक कि मानसून नहीं आ जाता तब तक चलता रहता है। 
   
   
   सर्दियों में कम बारिश के बाद मिट्टी अपनी नमी खोने लगती है। फिर फरवरी में माह में बसंत के समय पेड़ पौधे अपनी पुरानी पत्तियों को गिरा देते हैं जो सूख जाती है। ये सूखी पत्तियां और झाड़ियां जंगल में ईंधन का काम करती है। मार्च अप्रैल में तापमान भी धीरे धीरे बढ़ने लगता है। मई के आते आते तापमान वृद्धि से जंगल की नमी अवशोषित हो जाती है। फिर जंगल में हवा का वेग जब तेजी से चलता है तो ये छोटी सी आग की लपटें भी इन पत्तों और झाड़ियों को बहुत तेजी से राख बनाती हुई आगे बढ़ती जाती है। इसप्रकार से 
विकराल हुई आग को प्राकृतिक बारिश से ही रोका जा सकता है।

 मुख्यत: देखा गया है कि जंगल का अग्निकाल में फरवरी के बाद से आरंभ हो जाता है जो अप्रैल से तेजी पकड़ने लगता है और जून तक चलता है।

जंगल में आग लगने का कारण
   जंगल में आग लगने के कई कारण हो सकते हैं। हम प्राकृतिक कारणों को तो देखते हैं जिसमें हम जलवायु परिवर्तन, तापमान वृद्धि, सूखे पत्ते, घास, खरपतवार, मिट्टी की शुष्कता, हवा का वेग, शाखाओं की रगड़ का घर्षण आदि है लेकिन ये क्यों नहीं समझते कि ये आग प्राकृतिक से कहीं अधिक मानवनिर्मित है। 
    भारत के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के अनुसार जंगलों की आग प्राकृतिक आपदा नहीं होती है क्योंकि भारत में जंगल की अधिकतर आग मानव द्वारा जान बूझकर कृषि से जुड़े कारणों की वजह से लगाई जाती हैं इसलिए वनाग्नि को प्राकृतिक आपदा नहीं अपितु मानवनिर्मित ख़तरा मानना चाहिए। 
मानव की लापरवाही: मानव द्वारा की गई छोटी से छोटी लापरवाही जंगल में भीषण आग का रूप ले लेती है। बीड़ी सिगरेट की छोटी से छोटी बट हो या सुलगी हुई एक तिली या फिर पत्थर की रगड़ की चिंगारी लापरवाही से जलाया हुआ कोई भी छोटा टुकड़ा भी भयानक वनाग्नि में परिवर्तित हो सकता है।
मानव की खेती से जुड़ी गतिविधियां: लोग अपने खेत को बढ़ाने के लिए या उच्च गुणवत्ता की घास के लिए जंगल में आग लगा देते हैं। चीड़ की सूखी पत्तियां मिट्टी में मिलकर मिट्टी को अम्लीय करती हैं जो खेती की भूमि को नष्ट करती है। चीड़ की वृद्धि नियंत्रित करने, उपजाऊ भूमि के लिए, या मिश्रित वन के लिए स्थानीय लोग कभी कभी मिलकर इन सूखी पत्तियों, घास को आग लगा देते हैं जिससे खेती के लिए भूमि मिले।
मानव की भू तृष्णा: मानव की भू तृष्णा ऐसी है कि इसके लिए कुछ लोग जंगल तक नष्ट करने को तैयार हो जाते हैं। भू माफिया या अन्य समृद्धशाली लोग अपने लालच के चलते इन पहाड़ों पर होटल, रिजॉर्ट, घर बनाने के चक्कर में इन जंगलों को नुकसान पहुंचाते हैं। और इसके लिए सबसे सरल तरीका जंगल में आग लगाने का होता है जिससे वहां वनस्पति, पेड़ सब जल जाते हैं और भूमि निर्जीव हो जाती है।
मानव का अवैध कारोबार: कुछ लोग जंगल से जुड़े अवैध कारोबार में लिप्त होते हैं। जैसे हिमालय में कई ऐसी दुर्लभ प्रजाति पाई जाती है जिनका शिकार अवैध होता है। ऐसे ही लकड़ी भी होती है जिनका अवैध रूप से कटान होता है। इसलिए भी लकड़ी माफिया अपने अवैध कारोबार के लिए इन जंगलों को आग के हवाले कर देते हैं।
 चीड़ की लकड़ी से लीसा प्राप्त होता है जो वन क्षेत्र के अनर्गत आता है लेकिन साथ ही ये अत्यधिक ज्वलनशील होता है। जंगल बढ़ाने के लिए और अपनी आय वृद्धि के लिए भी इसके पेड़ अधिक लगा दिए जाते हैं। लेकिन अपनी कमाई के चक्कर में ये भूल जाते है कि जंगल में आग लगने से इन पेड़ों पर लीसा होने से आग जल्दी पकड़ती है। 
मानव की आपसी रंजिश: कुछ घटनाओं में पाया गया है कि केवल मानव की आपसी मतभेद के चलते इन जंगल को जलाया जा रहा है। जैसे कि जंगल के सरकारी कर्मचारी और स्थानीय गांव के लोगों के बीच सही तालमेल न होना। क्योंकि कई बार आदिवासी या स्थानीय लोग वनों पर अपना अधिकार समझते हैं और सरकारी कर्मचारी अपनी संपत्ति और इन सब चक्कर में कई बार जानबूझकर जंगल में आग लगा दी जाती है।

वनाग्नि की रोकथाम
  प्रतिवर्ष हमारे जंगल की आग से निकलने वाले कार्बन से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और उन नदियों को प्रभावित कर रहे है जो उत्तर भारत में पानी का स्रोत हैं। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जंगल का जलना संपूर्ण जल थल वायु सभी के लिए हानिकारक है इसलिए इस वनाग्नी की रोकथाम का प्रबंधन प्रभावकारी होना चाहिए। इसके लिए जितना सहयोग तकनीकी विशेषज्ञ का है उतना सहयोग जन मानस के जागरूक और संवेदनशील होने से भी है। 
   वैसे तो आग की घटना के लिए Fire 👉 Alarm👉 Action की तकनीक होती है। उसी तरह से जंगल में आग की छोटी सी घटना की सूचना भी अगर समय रहते मिल जाए तो आग पर काबू किया जा सकता है। 
   MODIS (मॉडरेट रेजोल्यूशन इमेजिंग स्पेक्ट्रो-रेडियोमीटर) सेंसर डेटा का उपयोग करके आग की घटनाओं का पता लगाया जाता है और पूरे जंगल की निगरानी फॉरेस्ट फायर अलर्ट सिस्टम (Forest Fire Alert System) के द्वारा की जा रही है। लेकिन हकीकत में आग का पता तो लग भी जाए लेकिन उत्तराखंड की भौगालिक स्थिति में फायर मैनेजमेंट के लिए अभी भी संसाधन और मैनपावर की कमी है। इसलिए इतने बड़े जंगल में एक्शन के लिए वन कर्मियों के साथ स्थानीय लोगों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।         
    जैसे सरकार लोगों को जागरूक अभियान से जोड़ सकती है। आग की घटनाओं को सूचित करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है और इसकी जिम्मेदारी भी दे सकती है। आग को काबू करने का आरंभिक ज्ञान दे सकती है और उचित प्रशिक्षण भी।
   पहाड़ पर समतल भूमि न होने से जल संचय नहीं हो पाता इसलिए ढलान पर जल संचयन विधि से मिट्टी में नमी बनाई जाने की तकनीक भी अपनानी चाहिए। पर्यटकों के लिए जगह जगह जंगल से जुड़ी नियम, सावधानी, चेतावनी और अन्य जानकारी दी जाए। सरकार की ओर से स्थानीय युवकों को जंगल प्रहरी नियुक्त कर सकती है। लापरवाही और अवैध काम के लिए कठोर दण्ड का प्रावधान तो है लेकिन ऐसे लोगों को पकड़ने के लिए उचित जांच की जाए। स्वार्थ से परे उठकर जंगल में मिश्रित वन को बढ़ावा दे। 

   नियम, कानून, दंड तो ठीक है लेकिन पहाड़ के लोगों के लिए जंगल केवल लकड़ी के लिए नहीं होता उनके देवता, उनके त्योहार, उनके गीत संगीत, उनकी संस्कृति, उनका जीवन भी होता है। इसलिए सरकार और स्थानीय लोगों का आपस में सहयोग से उनके विश्वास से, आपसी व्यापक संचार से अपने जंगल बचाए जा सकते हैं।
 
   (21अप्रैल अमर उजाला)


   वनाग्नि की आरंभिक रोकथाम आवश्यक है क्योंकि अगर ये व्यापक रूप ले लेती है तो जंगल के साथ रिहायशी क्षेत्र में  आकर घर परिवार भी स्वाहा कर सकती है और तब केवल प्राकृतिक बारिश के सहारे ही इसको काबू करने के बारे में सोचा जा सकता है। 

हमारा सहयोग: हमारा एक छोटा सा सहयोग भी बड़े वन को जलने से बचा सकता है। इसके लिए तो सबसे पहले हमें स्वयं ही जंगल के प्रति जागरूक और संवेदनशील होना होगा। हम लोग घूमने या पिकनिक के बहाने कई बार बोनफायर या खाना बनाने के लिए आग जला लेते हैं किंतु अपनी लापरवाही के कारण आज को खुला छोड़ देते हैं। इस तरह की गतिविधियों को जंगल में न करें। बीड़ी सिगरेट माचिस को अधूरा जलता हुआ कभी न छोड़े। कोई भी ज्वलनशील पदार्थ जंगल में न ले जाएं। ऐसे शरारती तत्व जो जंगल में इन गतिविधियों में लिप्त हो उनके बारे में सूचित करें। आग की किसी भी छोटी सी घटना के लिए संबंधित विभाग को तुरंत जानकारी दे। 
    इस 22 अप्रैल में अर्थ डे भी मनाया जाता है जिसका उद्देश्य ही पृथ्वी को हरा भरा और साफ रखना है जिससे हम अपनी पीढ़ी को एक सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण दे सकें।
  अपनी पृथ्वी को बचाने के लिए पेड़, पर्वत, पहाड़ सब जरूरी है। अगर इन सबको संकट होगा तो मानव जीवन भी संकट में आएगा और फिर हमारी आने वाली पीढ़ी ऑक्सीजन के लिए तरसेंगी। 
   हरे भरे पहाड़ सबके लिए हैं उनके हरे भरे जंगल भी सभी के लिए है इसलिए उसको बचाने की जिम्मेदारी भी सभी की है। 
  जागरूकता लाओ...आग बुझाओ...जंगल बचाओ।

एक -Naari
   



 

Comments

  1. It's really unfortunate that our natural resources are gutted into fire and we cannot find its solution...

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  2. Bilkul sahi kaha hai prakrati hume jeewan deti hai or hum use hi nuksaan pahuncha rahe hai jungle mei aag hum logo ke kaaran hi lagti hai hume tab mulya pata chalega jab humare bachche hariyali ke liye royenge

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