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Showing posts from May, 2023

नव वर्ष की तैयारी, मानसिक दृढ़ता के साथ

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नव वर्ष में नव संकल्प: मानसिक दृढ़ता New Year's Resolutions: Mental Strength/Resilience   यह साल जितनी तेजी से गुजरा उतनी ही तेजी के साथ नया साल आ रहा है। ऐसा लग रहा है कि एक साल तो जैसे एक दिन की तरह गुजर गया। मानो कल की ही तो बात थी और आज एक वर्ष भी बीत गया!   हर वर्ष की भांति इस वर्ष के अंतिम दिनों में हम यही कहते हैं कि 'साल कब गुजरा कुछ पता ही नहीं चला' लेकिन असल में अगर हम अपने को थोड़ा सा समय देकर साल के बीते दिनों पर नजर डालें तो तब हम समझ पाएंगे कि सच में इस एक वर्ष में बहुत कुछ हुआ बस हम पीछे को भुलाकर समय के साथ आगे बढ़ जाते हैं।    इस वर्ष भी सभी के अपने अलग अलग अनुभव रहे। किसी के लिए यह वर्ष सुखद था तो किसी के लिए यह वर्ष दुखों का सैलाब लेकर आया। सत्य भी है कि इस वर्ष का आरंभ प्रयागराज के महाकुंभ से हुआ जहां की पावन डुबकी से मन तृप्त हो गया था तो वहीं प्राकृतिक आपदाओं और आतंकी घटनाओं से मन विचलित भी था। इस वर्ष की ऐसी हृदय विदारक घटनाओं से मन भय और शंकाओं से घिरकर दुखी होने लगता है लेकिन आने वाले वर्ष की मंगल कामनाओं के लिए मन को मनाना ...

छुट्टियों की तैयारी

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 छुट्टियों की तैयारी   बच्चों की छुट्टियां पड़ चुकी हैं और कितनों के घर में समान भी बंध गए। कुछ लोग गर्मी से राहत पाने के लिए कुछ दिन ही सही लेकिन कितने ही लोग पहाडों पर जा रहे है तो कोई नदी या बीच की ओर प्रस्थान कर रहे है। लेकिन अभी भी बहुत से इसी सोच में हैं कि "बच्चों को छुट्टियों में कहाँ घुमाएं?" ।    अब लगभग सभी अपनी अपनी तरह से किसी न किसी जगह पर घूमने का मन बनाते हैं और वहाँ जाकर खूब आनंद लेते हैं। लेकिन आप किसी भी जगह का लुत्फ़ उठाएं लेकिन छुट्टियों के दो चार दिन भी अगर बिना अपने घर, गांव या मायके में न गुज़रे तो छुट्टियां और मौसम दोनों अधूरे लगते हैं, खासकर कि महिलाओं और बच्चों को।       बचपन का घर    बच्चों के लिए तो जैसे ये एक ग्राष्मकालीन त्यौहार है जो वो अपने नाना नानी, दादा दादी,  भाई बहनों के साथ मिलकर मनाते हैं। ये वो जगह होती है जहाँ वो राजा बाबू बनकर स्वछंद रूप से खूब मस्ती करते हैं। वहीं महिलाओं के लिए ये सालाना किया जाने वाला कोई संस्कार है जिसे हर वर्ष निभाना आवश्यक लगता है। हालांकि काम काजी ...

थोड़ा खाएं पर ताज़ा खाएं।

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थोड़ा खाएं पर ताज़ा खाएं। हम सभी को ज्ञात है कि गर्मियों में खानपान जितना सादा, सुपाच्य और हल्का हो उतना ही अच्छा है और भोजन ताजा खाया जाए वो ही स्वास्थ्य के लिए सबसे अच्छा है। किंतु फिर भी हम लोग कई बार अपनी आदतों या अपने आलस या फिर समय की कमी या फिर अन्य कारणों से बासी भोजन करते हैं जो स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है।    क्योंकि ताज़े भोजन में हमें जो पोषक तत्व मिलते हैं वो बासी भोजन से नहीं मिलते। उनसे केवल पेट भरा जा सकता है, स्वस्थ शरीर नहीं। इसके उलट बासी खाने से कई प्रकार के उदर (पेट) रोग हो जाते हैं। इसलिए थोड़ा खाओ लेकिन ताज़ा खाओ। बासी खाना किसे माना जाए: बचा हुआ खाना (leftover food) कुछ समय के बाद बासी कहलाता है साथ ही हम कह सकते हैं कि पकाए हुए भोजन के 3 घंटे के बाद जो बचा हुए खाना हो उसे बासी मान लेना चाहिए। सुबह की बनाई सब्जी दोपहर में खाने पर बासी मानी जाती है। यानी की एक पहर के बाद भोजन बासी हो जाता है।   क्यों न करें बासी भोजन का सेवन:    ताजे भोजन करने से आवश्यक पोषक तत्व और विटामिंस शरीर को मिलते हैं जबकि इसी भोजन...

मेरा सूरज

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मेरा सूरज रसोई से गुनगुनाने की आवाज़ आती है: "मेरा सूरज है तू, मेरा चंदा है तू, आ मेरी आँखों का तारा है तू.."  माँ..। माँ, मैं जा रहा हूँ। (सूरज अपने जूतों के फीते बाँधते हुए )  अरे लेकिन कहाँ,, आज संडे के दिन। वो भी इतनी सुबह सुबह। कम से कम, आज तो शांति से घर बैठ।   माँ तुम्हारे प्रेशर कुकर की सीटी भी तो संडे हो या मंडे, सुबह से शाम तक बजती रहती है। आप कभी शांत नहीं बैठ सकती क्या?  क्या बोलता रहता है। मैं तो बस पूछ रही हूँ।  तुम्हें पता तो है फिर भी हर बार टोकती हो। कितनी बार बताऊँ कि हर सन्डे की सुबह 6 - 9 हमारा क्रिकेट मैच होता है।  पता है लेकिन तु तो 12 बजे से पहले कभी घर आता ही नहीं है इसीलिए बोल रही हूँ कि आज तो तू 10 बजे तक हर हाल में घर पहुँच जाना नहीं तो नाश्ता नहीं मिलेगा और हाँ, पापा की डाँट अलग से मिलेगी। तुझे भी और मुझे भी।  ओह हो! हर बार पापा के नाम से डराती रहती हो। माँ आपका ज्ञान न संडे की सुबह से ही शुरू हो जाता है।   मेरे चंदा मेरे सूरज,,,तुझे पता है सुबह-सुबह मां की आवाज का कानों में जाना शुभ होता है। चल अभ...

लीव नो ट्रेस (LEAVE NO TRACE)

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लीव नो ट्रेस (LEAVE NO TRACE)     उत्तराखंड में बारहों मास पर्यटन के अवसर हैं किंतु तीर्थ यात्रा यानी कि चार धाम यात्रा के समय (अप्रैल - अक्टूबर) पर्यटन अपने चरम पर होता है। सप्ताहांत वाला सिद्धांत (वीकेंड थ्योरी) अब केवल मेट्रो या महानगरों का ही नहीं अपितु हर स्थान के यात्री को भाता है तभी तो जहाँ अन्य दिन केवल भीड़ होती है वहीं वीकेंड पर कुछ स्थान पर कुंभ होता है।     जब से यातायात की सुविधा और तकनीकी ज्ञान ने अपनी उड़ान भरी है तभी से पर्यटन को भी नए पंख मिल गए हैं। इसीलिए उत्तराखंड में यात्रा के समय पर्यटकों की भीड़ होना अब सामान्य हो गया है। हजारों लाखों लोग इस समय उत्तराखंड की यात्रा पर निकलते हैं।    खैर! समय चाहे जो भी हो यात्रा तो सभी करते ही हैं और करनी भी चाहिए। और जब उत्तराखंड देव स्थान और अपने नैसर्गिक एवं प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर् है तो यहाँ यात्रियों/सैलानियों का आना सामान्य है।    अगर आप उत्तराखंड में किसी भी तरह की यात्रा या फिर कैंप करने की सोच रहे हैं तो Leave No Trace (LNT) लीव नो ट्रेस को अपनाएं। वैसे इ...