Posts

कुछ कहता है 2022...Goodbye 2022

Image
कुछ कहता है 2022... Self Assessment (आत्म आंकलन)     बस अब कुछ दिन शेष है और नव वर्ष हमारे सामने अपने स्वागत के लिए खड़ा है और हम भी नव वर्ष के आगमन की तैयारी में हैं। इन बचे हुए बाकी के दिनों में हम बस यही कहते और सुनते चले जाते हैं कि "साल कब बीत गया, पता ही नहीं चला!" और पता भी तो कैसे चलेगा क्योंकि हम सभी अपने अपने जीवन में सेकंड की सुई की तरह से चलायमान है। जैसे समय किसी के लिए नहीं रुकता वैसे ही जीवन का पहिया भी लगातार चलता रहता है। तभी तो समय गुजरता रहता है और हम अपने उम्र के सफर में आगे बढ़ते रहते हैं।    नए साल में कदम रखने की खुशी तो सभी को होती है इसीलिए तो लोग अपनी खुशीयां मनाते घर, बाजार, होटल, हिल स्टेशन या पवित्र धामों में दिखाई दे जाते हैं। जहाँ नव वर्ष के आगमन का शोर है वहीं बीता हुआ वर्ष भी कुछ कहता है जिसे सुनना भी जरूरी है।    'गुजरा साल कब बीता पता ही नहीं चला' की रट छोड़कर 'गुजरा साल कैसे बीता'...इस पर एक मनन अवश्य होना चाहिए। क्योंकि आने वाले कल के सुधार के लिए बीते हुए कल की एक झलक जरूरी है।     बीता हुआ पिछला वर्ष किसी के

जीवन अनमोल है... Take care

Image
Mind, Body and Add Friends...    ये जरूर है कि पैसा जरूरी है। बिना पैसे के आज के समय में कुछ भी नहीं मिल सकता है लेकिन फिर भी कहा जाता है कि मनुष्य का सबसे बड़ा धन स्वास्थ्य है। अगर शरीर स्वस्थ है तो ये मानिये कि आपके पास एक अनोखा खजाना है जो आपकी समृद्धि को कई गुना बढ़ा देगा और सबसे अच्छी बात, कि ये धन केवल आपका है जिसे कोई चोरी भी नहीं कर सकता। फिर भी कितने ही लोग स्वास्थ्य के अमूल्य धन को किनारे लगाकर अन्य भौतिक चीजों पर पूरा ध्यान केंद्रित कर देते हैं जो बाद में उनके पछतावे का कारण बनता है।     ये अवश्य है कि पैसा हमारी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तो आवश्यक है लेकिन ये आवश्यक नहीं कि पैसे से हमारी शरीरिक, मानसिक और सामाजिक आवश्यकताओं की भी पूर्ति हो या फिर हम इस पैसे से अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त कर सके लेकिन हाँ, अच्छे स्वास्थ्य के कारण हम धन कमा सकते हैं। लेकिन फिर भी जाने क्यों आज हम इस बात को थोड़ा भूलते जा रहे हैं। अपने स्वास्थ्य को नज़रंदाज करते हुए, केवल धन और अन्य भौतिक वस्तुओं के पीछे भाग रहे हैं। या फिर ऐसी जीवन शैली अपना रहे हैं जिससे हमारी सेहत प्रभावित

टैटू बनाना सही या गलत!!

Image
टैटू बनाना सही या गलत!! (Tattoo is right or wrong)     "आखिर जरूरत क्या है...ईश्वर की दी हुई देह में छेड़ छाड़ की अच्छा खासा तो शरीर है त्वचा है फिर ये एक पतली सुई से शरीर को गुदवाना और नीली लाल स्याही से चित्रकारी करना उचित है क्या?? ऐसी क्या आफत आई कि टैटू के कारण दर्द को सहा जाए!! "   ये सब तभी लिखा जब जीवन का एक अनुभव अपने शरीर को गुदवाते जिसे आज के समय में टैटू कहते के रूप में ले रही थी। मुझे लग रहा था कि कहीं मैंने गलत निर्णय तो नहीं ले लिया!! बस इतना ही सोचा और लिखा क्योंकि शरीर में सुइयों की चुभन का दर्द तो था ही और साथ में मशीन की गर्र-गर्र की आवाज ने दिमाग को शून्य कर दिया था। उसके बाद तो बस यही सोचा कि अब जब ओखल में सिर रख दिया तो मूसल से क्या डरना..!!'   और अब जब टैटू आर्टिस्ट (प्रकाश शाही) ने अपना काम आरंभ कर दिया था तो अब बचा नहीं जा सकता क्योंकि गुदवाने का कार्यक्रम अब चल चुका था।    छोटे भाई के टैटू देखकर इच्छा तो बहुत समय से थी कि एक बार इसका भी अनुभव लिया जाए क्योंकि उसके हाथ, गर्दन और कंधे में भी टैटू हैं.. .इसीलिए तीन चार साल पह

100th Special: Thank You

Image
100th Special: Thank You & Happy Diwali         आज का लेख मेरे लिए बहुत खास है क्योंकि ये 100वां लेख है और वो भी सबसे खास त्यौहार दिवाली के साथ। भले ही ये आंकडा बहुत बड़ा न हो लेकिन 'शतक' की तो अपनी पहचान है। कितने लोग मेरा लेख पढ़ते हैं या नहीं भी पढ़ते, कितने लोग मुझे जानते हैं और कितने नहीं भी जानते लेकिन उन सभी की शुभकामनाओं के लिए बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद।    पिछले लगभग दो ढाई सालों से अच्छा बुरा जो भी मन किया बस वो लिख दिया। न कोई विषय विशेष न कोई व्यक्ति विशेष, बस जैसा लगा वैसा लिख दिया लेकिन एक चीज थी जो बड़ी ही सामान्य थी वो थी संतुष्टि। हर एक पोस्ट के बाद एक तसल्ली मिलती थी, एक खुशी होती थी कि मैंने अपने लिए समय निकालकर कुछ तो लिखा है. भले ही इसके लिए हफ्ते दो हफ्ते का समय लगा हो!   लिखने का सफर भी कोरोना काल से ही आरंभ हुआ है जो बहुत लंबा तो नहीं है लेकिन न भूलने वाला है। यह समय सभी के लिए बहुत कठिन और कष्टदायी था लेकिन इस कठिन समय ने बहुत कुछ सिखाया भी।    कोरोना के समय लॉक डाउन में जहाँ सभी परेशान थे वहीं सुकून का एक कोना मुझे पढ़ने और लिखने से मि

बालमन का दशहरा

Image
   बालमन का दशहरा     बाल मन पढ़ना बहुत ही कठिन है या यूँ कहो कि उसको समझना अपने बस की बात नहीं है। सुबह से लेकर रात तक तरह तरह के रूप देखने को मिलते हैं। गुस्सा, जिद्द, लाड, प्यार, लड़ाई, बचपना, सयानापन, मस्ती, नादानी और न जाने क्या क्या रूप घड़ी घड़ी देखने को मिलते हैं और इन सभी रूपों से निपटने के लिए मेरा तो धैर्य कितनी बार टूट जाता है लेकिन अगले ही पल दिल को तसल्ली देती हूँ कि ये सब केवल कुछ साल तक ही है। उसके बाद तो बचपन हवा हो जायेगा और फिर बस जिंदगी किसी न किसी रेस में भागती दौड़ती मिलेगी और तब बचपन के यही दिन और रूप याद आयेंगे।      नटखट कम शैतान जय ऐसा ही है जो दिन भर नाक में दम करके रखता है। घड़ी घड़ी उसकी मनमानी चलती रहती है, जिद्द चलती रहती है इसलिए उसे डाँट भी मिलती है और मार भी लेकिन कभी कभी उसके बाल मन की कल्पनाओं से आश्चर्य भी होता है और लाड भी। जैसे आजकल वो राम लीला की कल्पनाओं में उड़ान भर रहा है। अब घर में तो आजकल न रामायण देखी जा रही है और न ही पढ़ी जा रही है लेकिन जय स्कूल से सीख कर जरूर आया है क्योंकि वो स्कूल से रावण का मुखोटा लेकर आया है और अब घर प

चेलुसैन: एक खूबसूरत गांव

Image
चेलुसैन: एक खूबसूरत गांव    दिन के 11:45 बज  गए थे और अब तो आखिर निकल ही गए हम एक और खूबसूरत जगह के लिए। हालांकि हर बार की तरह इस बार भी निकलना तो जल्दी ही था लेकिन ऑफिस का मोह रह रह कर भी उमड़ ही आता है इसलिए जहाँ 8 बजे जाना था वहाँ 12 बज गए। वैसे तो 8 भी थोड़ा देर ही था लेकिन क्या करें,,, जय की स्कूल वैन जो पौने आठ बजे आती है! उसे स्कूल भेजने के बाद ही निकलना उचित समझा।    हाँ, इस बार की यात्रा में न तो जिया और न ही जय हैं क्योंकि  जिया ने छुट्टी लेने से मना कर दिया था। मनाया तो बहुत जिया को लेकिन उसको तो अपनी कक्षाएं लेनी ही थी ( सच में बेटियां पढ़ाई के प्रति बेटों से थोड़ा अधिक गंभीर होती हैं)। लेकिन जय को तो कभी भी कहीं भी ले चलो,,, हमेशा तैयार मिलता है। लेकिन इस बार नटखट जय को भी घर ही छोड़ना पड़ा। बिना जिया के उसे साथ ले जाना हमारे लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी क्योंकि उसे भी अपना साथ अपनी जिया दीदी के साथ ही मिलता है सो इस बार का सफर केवल अपना था।    हम जा रहे थे चैलूसेंण। नाम कुछ अलग सा लगा होगा, शायद किसी ने पहली बार ही सुना होगा लेकिन उत्तराखण्ड  के घुमंतू लोग इस जग

हिमालय बचाओ... ये हमारा है।

Image
हिमालय बचाओ... ये हमारा है।     4 सितम्बर को एक खबर छपी थी कि गंगोत्री ग्लेशियर पीछे खिसक रहा है।    "वर्ष 1935 से 2022 के बीच 87 साल में देश के बड़े ग्लेशियरों में से एक उत्तराखंड का गंगोत्री ग्लेशियर 1.7 किमी पीछे खिसक गया है।"   चौकनें वाली खबर तो थी ही लेकिन सबसे अधिक तो ये हमारे लिए चिंता की बात है। ये केवल एक ग्लेशियर की बात नहीं है ऐसा ही कुछ हाल लगभग हिमालयी राज्यों के ग्लेशियर के साथ भी है। अब तो लगभग हर साल कभी बाढ़ तो कभी सूखा और वनाग्नि की घटनाएं हो रही है।     हिमालय हमारे देश का ताज है। इसके अंगों (ग्लेशियर, पहाड़, नदी, जंगल, जमीन) को गलने से बचाना है क्योंकि यह केवल अध्यात्मिक केंद्र, या साहसिक खेल या केवल फिर रोमांच का स्थान भर ही नही है यह हमारी जीवन रेखा है क्योंकि इसके अथाह प्राकृतिक संसाधनों के चलते ही हम अपना जीवन यापन कर रहे हैं। मनुष्य प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से हिमालय पर निर्भर है। देश के 65 प्रतिशत लोगों के लिए पानी की आपूर्ति यही हिमालय करता है और साथ ही रोज रोटी का प्रबंध भी।     लेकिन हम अपनी धरोहर और अपने प्राकृतिक संसाधनों का बे लगाम

Happy Teachers Day

Image
  Happy Teachers Day    कहते हैं जो सिखाए वही गुरु है और मनुष्य के अंदर सीखने का गुण हो तो उसे जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य अपने पास बहुत से गुरुजन पाता है जहाँ वो दूसरों से कुछ न कुछ सीखता है। घर से, परिवार से, विद्यालय से, साथ से, समाज से, इस प्रकृति से हम हमेशा कभी न कभी किसी न किसी रूप में कुछ तो सीखते ही है इसलिए सम्मान तो सभी के लिए होना चाहिए लेकिन जो शिक्षा गुरुकुल में अक्षर ज्ञान और अनुशासन के साथ हमें अपने शिक्षकों द्वारा मिलती है वो बहुत अनमोल होती है इसीलिए उन शिक्षकों के लिए एक दिन सम्मान के साथ धन्यवाद का भी।      5 सितम्बर को शिक्षक दिवस है तो सभी अपने गुरुजन को प्रणाम करते हैं। अपने शिक्षकों के प्रति सम्मान और आदर व्यक्त करते हैं। स्कूल कॉलेज में तो शिक्षकों को सम्मानित भी किया जाता है और कई भव्य कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। कुल मिलाकर आज का दिन समर्पित होता है शिक्षकों के लिए जिन्होंने अपने ज्ञान से हमें एक कोमल पौध से एक वृक्ष बनाया।    भारत में गुरु का महत्व प्राचीन काल से ही रहा है। भारत की पहचान ही यहाँ की संस्कृति और सभ्यता है और हमारी संस्कृति क

रंग बिरंगी बिंदी

Image
बिंदिया चमकेगी....    आज किसी ने कहा कि आप पर बिंदी बहुत खूब लगती है तो मैंने हंस कर जवाब दिया कि मुझ पर ही नहीं हर नारी पर बिंदी खूब फबती है। और इसके साथ ही याद आया एक किस्सा जो बिंदी पर ही था। इसलिए आज का लेख... बिंदीया विशेष...     बहुत साल पहले लगभग इसी तरह का मौसम था। बारिश, धूप और उमस के बीच में झूझते हुए पास ही की एक दुकान में थी। जहाँ तीज की खरीदारी के समय मुझसे किसी ने कहा था कि तुम बिंदी क्यों नहीं लगाती हो। साथ ही ताना भी दिया था कि आजकल औरतें बिंदी लगाने में शर्म करती हैं और सोचती है कि दुनिया को जरा बेवकूफ बनाया जाए।     अब मेरा बिंदी लगाने या नही लगाने का कारण कुछ भी हो सकता है लेकिन उस समय बुरा तो बहुत लगा था। लेकिन अपनी प्रकृति थोड़ी,,,'छोड़ परे और मट्टी पा ' जैसी है इसलिए बिना किसी ओर ध्यान दिए मैं आगे बढ़ गई। आज सोचती हूँ कि उन्होंने बात भले ही अलग अंदाज से बोली हो लेकिन बिंदी तो हर किसी के माथे की शोभा बढ़ाती है। इसीलिए तो मैं अपनी पारंपरिक परिधान के साथ हमेशा बिंदी लगाती हूँ।    बिंदीया भारतीय नारी की पहचान है और हिंदू मान्यता में हर सुहागन स्त्र

अमृत महोत्सव में जन्माष्टमी

Image
अमृत महोत्सव में जन्माष्टमी देश को कृष्ण चाहिए...     भारत अपनी समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक गौरव और विवधता में एकता के लिए जाना जाता है। यहाँ पर्व त्यौहार, गीत संगीत मेले समय समय पर आकर हमें आपस में जोड़ते रहते हैं और इस बार अगस्त का जो यह समय है वो तो लगता है अपने साथ पर्वों की गठरी बांधे आया है। रक्षा बंधन आया, घी संक्रांत आया, ७६वां स्वतंत्रता दिवस आया और साथ ही श्री कृष्ण जन्माष्टमी भी। अब इन सब त्योहारों के चलते तो बस एक ही विचार आता है कि हमारे लोक पर्व हो या राष्ट्रीय पर्व सभी के लिए उल्लास, ख़ुशी, उमंग और सम्मान एक जैसा ही है। हमारे सारे पर्व ही भारत कि संस्कृति और सभ्यता को समेटे हैं।    भारत को स्वतंत्र हुए 75 वर्ष हो चुके हैं और इसकी ख़ुशी इस वर्ष के स्वतंत्रता दिवस पर सभी के चेहरों से लेकर घर तक नज़र आई। सरकार ने तो इन 75 वर्षों कि खुशी आज़ादी का अमृत महोत्सव नाम से मार्च 2021 से ही आरम्भ कर दी थी लेकिन हर हिन्दुस्तानी के लिए ये महोत्सव तो 15 अगस्त 1947 से ही आरम्भ हो गया था क्योंकि हमें आज़ादी यूं ही नहीं मिली। इसके लिए हमारे स्वतंत्रता सैनानियों ने अपने लहू को इस धरती